BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Sunday, June 16, 2013

मुखपृष्ठ दलित साहित्य की धुरी

दलित साहित्य की धुरी

Sunday, 16 June 2013 12:16

जनसत्ता 16 जून, 2013: पिछले दो दशक के दौरान हिंदी साहित्य में कई महत्त्वपूर्ण विमर्श हुए हैं। इसी कड़ी में आंबेडकरवादी साहित्य के वरिष्ठ आलोचक तेज सिंह की पुस्तक आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा हाल में प्रकाशित हुई है।

इस पुस्तक में लेखक ने हिंदी दलित साहित्य के नामकरण, चिंतन परंपरा, प्रेरणा-स्रोत और दलित साहित्यकारों के लेखन पर सवाल उठाए हैं। तेज सिंह 'दलित साहित्य' के नामकरण को 'जाति' की परिधि में बंधा हुआ पाते हैं। जाति-व्यवस्था को तोड़ने के लिए गौतम बुद्ध से लेकर ज्योतिबा फुले, कबीर, भीमराव आंबेडकर आदि ने आजीवन संघर्ष किया और वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि को अपनाने की सीख दी। लेकिन हिंदी के  ज्यादातर दलित साहित्यकारों ने आंबेडकर के 'जातिविहीन' समाज बनाने के स्वप्न को बदल कर 'जातिवादी' समाज और साहित्य की रचना में अपनी ऊर्जा लगाई।
लेखक ने पुस्तक की भूमिका में कहा है कि हिंदी के तथाकथित दलित साहित्यकारों ने डॉ आंबेडकर के विचारों को सतही तौर पर अपनाया है, उन्हें एक निश्चित धारणा के तहत विचारधारा में नहीं बदला। यही वजह है कि उनमें आंबेडकर के जाति संबंधी विचार तो मिल जाते हैं, मगर आंबेडकरवादी चेतना के दर्शन नहीं होते और न ही आंबेडकरवादी विचारधारा दिखाई देती है। धर्मवीर, श्योराज सिंह 'बेचैन' और दलित साहित्य के 'सर्वेसर्वा' सोहनपाल सुमनाक्षर आदि साहित्यकार इसी श्रेणी में आते हैं, जो आंबेडकर का नाम लेते-लेते अपनी-अपनी जाति को मजबूत करते हुए अपनी ऊर्जा नष्ट करने में लगे हैं। दूसरी श्रेणी में ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान जैसे लेखक आते हैं। दोनों ही समूहों के साहित्यकारों की 'दलित चेतना' दो खास जातियों के दायरे में सिमट कर रह जाती है। 'जाति चेतना' से जाति प्रथा को खत्म नहीं किया जा सकता, बल्कि इससे उसे और मजबूती ही मिलेगी। इसलिए तेज सिंह ने 'दलित साहित्य' की जगह 'आंबेडकरवादी साहित्य' की अवधारणा प्रस्तुत की है। यही लेखक की दलित साहित्य के मौजूदा सोच से इतर नजरिया है।
यह पुस्तक छह आलोचनात्मक लेखों में विभाजित है। सभी लेखों में 'आंबेडकरवादी' शब्द पर जोर दिया गया है। 'आंबेडकरवादी विचारधारा और समाज' पुस्तक का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें लेखक जातिवादी व्यवस्था के मूल सवालों से टकराता नजर आता है। लेखक का मानना है कि अभी तक भारत की समाज-व्यवस्था को जाति आधारित संरचना के अध्ययन में दो तरह की ऐतिहासिक भूलें हुई हैं। पहली, जाति-व्यवस्था को सामाजिक संरचना मान कर केवल उसकी सामाजिक समस्याओं पर ही ध्यान केंद्रित करना, और दूसरी, उसे आर्थिक संरचना मान कर केवल आर्थिक पहलुओं से देखना। जबकि जाति-व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक, दोनों ही संरचनाओं के आधार पर विकसित हुई है।

लेखक ने जाति-व्यवस्था के फलस्वरूप समाज में गैरबराबरी और वैमनस्य को खत्म करने के लिए केवल दलित महापुरुषों के चिंतन को अपनी पुस्तक का आधार नहीं बनाया है, बल्कि मार्क्स, लेनिन, एंगेल्स, माओ आदि विश्व के बड़े वामपंथी विचारकों को भी इसमें शामिल किया है। इसलिए पूरी पुस्तक में तेज सिंह पर आंबेडकर के विचारों के साथ-साथ मार्क्सवादी विचारकों का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। इस पुस्तक में लेखक की ऐतिहासिक दृष्टि भी स्पष्ट रूप में सामने आती है, जिसमें वे मूल रूप से आंबेडकर के साथ-साथ बुद्ध, कबीर, फुले आदि को भी 'आंबेडकरवादी साहित्य' का आधार मानते हैं। इसी प्रक्रिया में वे आंबेडकर और मार्क्सवाद के वैचारिक अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- 'डॉ आंबेडकर का मुख्य विरोध मार्क्सवाद से नहीं, मार्क्सवाद के वर्ग-सिद्धांत से है, सशस्त्र क्रांति से है और सर्वहारा की तानाशाही से है...। इसलिए डॉ आंबेडकर सशस्त्र क्रांति के बजाय सामाजिक लोकतंत्र में विश्वास रखते थे और स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता आदि जनवादी मूल्यों के बिना सामाजिक लोकतंत्र कायम नहीं हो सकता। डॉ आंबेडकर समाजवाद के स्थान पर राजकीय समाजवाद की स्थापना पर अधिक बल देते हैं।'
लेखक ने पुस्तक में जो समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाया है, वह आंबेडकरवादी हिंदी साहित्यकारों के वैचारिक चिंतन को आधार प्रदान करेगा। इस लिहाज से 'कहानी का आंबेडकरवादी समाजशास्त्र' लेख महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है, जिसमें लगभग दो दर्जन दलित साहित्यकारों की कहानियों को शामिल किया गया है। इसे लेखक ने आंबेडकरवादी साहित्य की संज्ञा दी है। सवाल है कि इन दो दर्जन दलित कहानीकारों में कितने रचनाकार 'दलित साहित्यकार' कहलाना पसंद नहीं करते हैं?
जहां तक चिंतन परंपरा और प्रेरणा-स्रोत के स्तर पर 'दलित साहित्य' और 'आंबेडकरवादी साहित्य' के तुलनात्मक स्वरूप का सवाल है, उसमें अंतर नजर आता है। हिंदी दलित साहित्यकारों ने आंबेडकर को ही दलित साहित्य के प्रेरणा-स्रोत के रूप में स्वीकार किया है, जबकि तेज सिंह ने आंबेडकरवादी साहित्य के लिए गौतम बुद्ध, कबीर, ज्योतिबा फुले आदि को भी आधार माना है।

अश्वनी कुमार
आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा: तेज सिंह; लोकमित्र, रोहताश नगर, शाहदरा, दिल्ली- 32; मूल्य: 70 रुपए।

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/47048-2013-06-16-06-47-22

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