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Monday, May 22, 2017

এক শ বছরের মধ্যেই এই পৃথীবী ছেড়ে যেতে হবে,কতজন পারবেন গ্রহান্তরে বসবাস করতে? Next thing RSS might do,it might replace Gandhi with Ambedkar to make India full bloom Hindu Nation and no resistance is possible but creative resistance! Stephen Hawking says we must start searching for the next Earth The physicist warns that Earth is becoming overpopulated and it's time to start looking for a new home. পলাশ বিশ্বাস

এক শ বছরের মধ্যেই এই পৃথীবী ছেড়ে যেতে হবে,কতজন পারবেন গ্রহান্তরে বসবাস করতে?

Next thing RSS might do,it might replace Gandhi with Ambedkar to make India full bloom Hindu Nation and no resistance is possible but creative resistance!

Stephen Hawking says we must start searching for the next Earth

The physicist warns that Earth is becoming overpopulated and it's time to start looking for a new home.

জীবন জীবিকা ,শিক্ষা ও চিকিত্সারর সঙ্গে এই পৃথীবীকে বসবাস যোগ্য করে রাখার লড়াঈ অনিবার্য..ষোলো শতাব্দীর ভবিষ্যদ্বক্তা নস্ট্রাডামুসের চেয়ে বিশ শতাব্দীর বিজ্ঞানী স্টিফেন হকিংয়ের ভবিষ্যদ্বাণীর দাম বেশি। বহুবার নস্ট্রাডামুসের নামে 'কেয়ামত'-এর ভবিষ্যদ্বাণী করা হয়েছিল, বহুবার সেসব ভুল প্রমাণিত হয়েছে। কিন্তু 'সময়ের সংক্ষিপ্ত ইতিহাস'-এর লেখক হকিং যখন বলেন, 'বাঁচতে হলে মানুষকে ১০০ বছরের মধ্যে পৃথিবী ছাড়তে হবে'; তখন কাণ্ডজ্ঞানওয়ালা মানুষ ভয় পাবেই।

Now Hawking, the renowned theoretical physicist turned apocalypse warning system, is back with a revised deadline. In "Expedition New Earth" — a documentary that debuts this summer as part of the BBC's "Tomorrow's World" science season —‚ Hawking claims that Mother Earth would greatly appreciate it if we could gather our belongings and get out — not in 1,000 years, but in the next century or so.

জীবন জীবিকার  মরণ বাঁচন লড়াঈয়ের এর নরসংহার সংস্কৃতির মুক্তবাজারে প্রখ্যাত পদার্থবিদ স্টিফেন হকিং মনে করেন, অস্তিত্ব রক্ষা করতে হলে আগামী এক শতাব্দীর মধ্যেই মানবজাতিকে পৃথিবী ছাড়তে হবে। বেঁচে থাকার জন্য অন্য কোনো গ্রহে আবাস গড়তে হবে মানুষকে।আমি প্রথমথেকেই ক্রিএটিভ এক্টিভিজ্ম কেই রেসিস্ট ফ্যাসিস্ট নিরন্কূশ গ্লৌবাল অর্ডারের ও ধর্মীয় মৌলবাদী রাষ্ট্র ও রাজনাতির বিরুদ্ধে মানুষের বেঁচে বর্তে থাকার একমাত্র বিকল্প রাজনীতি বলে আসছি।বাংলা ,বাংলাদেশ ও বাঙালি জনসমগ্রের জন্য ধর্মীয় রাষ্ট্র ও রাজনীতি এই মুহুর্তে সবচেয়ে বড় বিপর্যয় গোরিকীকরণের সুনামী সময়ে

জলবায়ু পরিবর্তনের প্রভাব, মহামারি ও জনসংখ্যা বৃদ্ধির কারণে এ গ্রহের অস্তিত্ব হুমকির মুখে পড়ছে বলে মনে করেন ব্রিটিশ এই বিজ্ঞানী। স্টিফেন হকিং 'এক্সপেডিশন নিউ আর্থ' নামের বিবিসির একটি নতুন তথ্যচিত্রে এ মন্তব্য করেছেন। খবর দ্য টেলিগ্রাফের।

বিবিসি টু'তে ওই তথ্যচিত্র সম্প্রচার করা হয়েছে। এ তথ্যচিত্রের নির্মাতা হকিং নিজেই। এতে হকিং বলেছেন, জলবায়ুর পরিবর্তনের প্রভাব, উল্কার আঘাত, মহামারি এবং জনসংখ্যা বৃদ্ধি এ গ্রহটিকে 'ক্রমাগতভাবে বিপজ্জনক' করে তুলেছে।

অস্তিত্ব রক্ষা করতে হলে আমাদের এ পৃথিবী ত্যাগ করা প্রয়োজন। হকিংয়ের ধারণা, আমরা যদি নতুন একটি পৃথিবী খুঁজে পেতে ব্যর্থ হই, তবে মানবজাতির অস্তিত্ব সর্বোচ্চ ১০০ বছর পর্যন্ত টিকবে।

যুগান্তকারী ধারাবাহিক অনুষ্ঠান 'টুমোরোস ওয়ার্ল্ড' তৈরির জন্য হকিং ও তার সাবেক ছাত্র ক্রিস্টোফ গালফার্ড মহাকাশে কিভাবে মানুষ বাঁচতে পারবে তা অনুসন্ধান করতে পুরো বিশ্ব ভ্রমণ করবেন।

ভবিষ্যৎ সম্পর্কিত বিষয়াদি নিয়ে তৈরি টুমোরোস ওয়ার্ল্ড ধারাবাহিকটি ৩৮ বছর ধরে সম্প্রচারিত হওয়ার পর ১৪ বছর আগে বিবিসি বাতিল করে।

Media reports:Humanity's future is in space and it's time to start looking for our future home, according to physicist Stephen Hawking.

Speaking on Friday at The Royal Society in London, Hawking said, "I strongly believe we should start seeking alternative planets for possible habitation."

Earlier this month, Hawking predicted that if the human race is to survive, we will need to leave Earth within the next 100 years.

"We are running out of space on Earth," he said, "and we need to break through the technological limitations preventing us living elsewhere in the universe."

Fortunately for all of us, efforts are already underway to find a new home for humanity. Last year, SpaceX founder Elon Musk unveiled his plan to colonise Mars "in our lifetimes". Musk has set his sights on building rockets large enough to carry 100 passengers to self-sustaining cities in a terraformed Martian landscape.

If you'd rather try further afield, there's the Trappist-1 star system. Astronomers announced in February that at least seven Earth-sized planets have been discovered just 39 light years away. More significantly, three of those planets could potentially support life. Or there's Proxima b, a nearby exoplanet where life "could still be evolving long after our sun has died". Hawking's Breakthrough Starshot initiative already plans to target it for a flyby mission.

Colonising new planets will be the subject of Hawking's keynote speech at next month's Starmus event in Trondheim, Norway. He says that he's not alone in his views and that many of his colleagues will also discuss the subject in what he claims will be "an extraordinary festival."

Starmus is a celebration of science and the arts, founded by astrophysicist Garik Israelian. Next month's event will be the fourth Starmus festival. Speakers will include astronaut Buzz Aldrinprofessor Brian Cox and 11 Nobel laureates. But it's also rooted in the belief that music and the arts can help inspire scientific understanding and discovery. Director Oliver Stone will appear at this year's festival and its advisory board includes musician Peter Gabriel and Brian May, the Queen guitarist and astrophysicist who released his own VR viewer last year.

The Starmus festival aims to bridge the divide between scientists and the public. Neuroscientist and Nobel laureate Edvard Moser said it's important than ever that "science should not be an elitist activity." He criticised President Trump, who has been openly sceptical of the scientific consensus on global warming, pointing out that "a few months ago, we didn't even know what an alternative fact was." But he argued that the answer is to teach people how scientists collect data and how science corrects itself.

Starmus hosts the awards for the Stephen Hawking Medal for Science Communication, which recognises individuals who have helped the public better understand science through writing, music and film. This year's winners will be given a medal designed by Alexei Leonov, the first man to walk in space. They'll also receive an 18-karat gold Omega watch.

Hawking, 75, has previously warned that the threats of climate change, overpopulation, asteroid strikes and genetically engineered viruses will make the next century a particularly dangerous one for our planet. In recent years, he has also discussed the potential dangers of contact with aliensartificial intelligence and other avoidable catastrophes.

The Starmus festival will run from 18-23 June. It will be hosted by NTNU, the Norwegian University of Science and Technology.

Friday, May 19, 2017

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख ये अच्छे दिन आपको मुबारक हम अपने बच्चों के कटे हुए हाथों और पांवों का हम क्या करेंगे?

गांजा तस्करी मामले में आरएसएस और विहिप नेताओं को जांच के दायरे में लाया जाए- रिहाई मंच

बाद में मोमबतियां जलाने से बेहतर है जीते जी प्रोफेसर वाघमारे के साथ संघर्ष में शामिल हो जायें

योगी आदित्‍यनाथ का दावा : खत्‍म करेंगे अपराधियों का व्‍यवसायीकरण और तबादलों का उद्योगीकरण 

ऐसे "काम बोलता" था "विकास" के भैया का, 20 करोड़ बाँटने में खर्चकर दिए 15 करोड़

वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम

लालू प्रसाद यादव ने भाजपा-आरएसएस को जोर से डाँटा- मुझे धमकाने की हिम्मत मत करो, मैं दूसरों का हौसला डिगाता हूँ, मेरा कौन डिगाएगा?

अमेजन रीफ पर मंडरा रहा खतरा, और बढ़ा देगा जलवायु परिवर्तन के मुश्किलों को

चम्बल के बीचो-बीच जन संसद

लूट, प्रताड़ना और सतत् जुल्म की जमीन छत्तीसगढ़

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जुमलों के दम पर मोदी सरकार के तीन साल पूरे, झूठे बना रहे हैं खुशी: पैंथर्स

अच्छे दिनों के तीन साल का जश्न : सच छुपाने के लिए शोर

-ये अच्छे दिन आपको मुबारक हम अपने बच्चों के कटे हुए हाथों और पांवों का हम क्या करेंगे?

-आरएसएस की गर्भविज्ञान संस्कार परियोजना : भयावह अमानवीय नस्लीय परियोजना

भारत को समावेषी राष्ट्र बनने से रोकता है उत्तर भारतीय हिंदू मन

Achchhe Din : Jobs Are Going Away

Rss don't 'rework' Manusmriti 'Re-form' yourself

योगी सरकार के खुले संरक्षण में यूपी को श्मशान में तब्दील कर रही सवर्ण सामंती ताकतें

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Thursday, May 18, 2017

अपने बच्चों के कटे हुए हाथों और पांवों का हम क्या करेंगे? पलाश विश्वास

अपने बच्चों के कटे हुए हाथों और पांवों का हम क्या करेंगे?

पलाश विश्वास

बिना क्रय शक्ति के मुक्त बाजार में जीने की मोहलत किसी को नहीं है।क्रय शक्ति बिना उत्पादन के हवा में पैदा नहीं हो सकती।जब सांसें तक खरीदनी हों,हवा पानी बिन मोल नहीं मिलता, तब सेवाक्षेत्र और बाजार से किस हद तक कितने लोगों को वह क्रयशक्ति संजीवनी मिल सकती है।हम अपने अपने निजी जीवन में इस संकट से जूझ रहे हैं।

आजीविका और रोजगार के बिना खरीदने की क्षमता खत्म होने के बाद जीना कितना मुश्किल है,रिटायर होने के साल भरमें हमें मालूम हो गया है।

आज अनेक मित्रों ने सोशल मीडिया पर जन्मदिन की शुभकामनाएं भेजी हैं।उनका आभार।हम जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से हैं,वहां जीवन मरण का कोई खास महत्व नहीं है। न हम इसे किसी तरह सेलिब्रेट करने के अभ्यस्त हैं।

इस जन्मदिन का मतलब यह भी है कि साल भर हो गया कि हम रिटायर हो चुके हैं।हमने पूरी जिंदगी जिस मीडिया में खपा दी, वहां काम मिलना तो दूर, हमारे लिए कोई स्पेस भी बाकी नहीं है। मीडिया को कांटेट की जरुरत ही नहीं है। मार्केटिंग के मुताबिक कांटेट उस सरकार और कारपोरेट कंपिनयों से मिल जाती है। इसलिए मीडिया को संपादकों और पत्रकारों की जरुरत भी नहीं है।मीडिया कर्मी कंप्यूटर के साफ्टवेयर बन गये हैं।समाचार,तथ्य,विचार,विमर्श,मतामत,संवाद बेजान बाइट हैं और हर हाल में मार्केटिंग के मुताबिक है या राजनीतिक हितों के मुताबिक।बाकी मनोरंजन।

हमारे बच्चों को शिक्षा और ज्ञान के अधिकार से वंचित करके कंप्यूटर का पुर्जा बना देने के उपक्रम के तहत उनके हाथ पांव काट लेने का चाकचौबंद इंतजाम हो गया है।स्थाई नौकरी या सरकारी नौकरी या आरक्षण ये अब डिजिटल इंडिया में निरर्थक शब्द है। कामगारों के हकहकूक भी बेमायने हैं। कायदे कानून भी किसी काम के नहीं है। रेलवे में सत्रह लाख कर्मचारी अब सिमटकर बारह लाख के आसपास हैं और निजीकरण की वजह से रेलवे में बहुत जल्द चार करोड़ ही कर्मचारी बचे रहेंगे।

किसी भी सेक्टर में स्थाई कर्मचारी या स्थाई नियुक्ति का सवाल ही नहीं उठता और हायर फायर के कांटेक्ट जाब का हाल यह है कि मीडिया के मुताबिक सिर्फ आईटी सेक्टर में छह लाख युवाओं के सर पर छंटनी की तलवार लटक रही है।कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी की खबरें आ रही हैं. मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कॉग्निजान्ट ने दस हजार कर्मचारियों की छंटनी की है। इन्फोसिस ने दो हजार कर्मचारियों को अलविदा कहा तो विप्रो ने पांच सौ कर्मचारी हटाए हैं। इसके अलावा आईबीएम में भी हजारों लोगों की छंटनी की खबरें आयी हैं।

लेआफ की फेहरिस्त अलग है।यानी आईटी कंपनियों में छंटनी की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है। कुल मिलाकर इस वक्त आईटी सेक्टर की तस्वीर बेहद भयावाह दिख रही है। द हेड हंटर्स कंपनी के सीएमडी के लक्ष्मीकांत के मुताबिक आईटी सेक्टर में दो लाख लोगों की नौकरियां जाने की आशंका है।इसी बीच आईटी दिग्गज आईवीएम ने अपने एंप्लायीज की छंटनी की खबरों को निराधार बताते हुए ऐसी संभावनाओं को खारिज किया। हालांकि कंपनी के एंप्लायीज में से 1-2 फीसदी का परफ़ॉर्मेंस अप्रेजल प्रभावित हो सकता है। छंटनी की खबरों पर एक बयान जारी कर कंपनी ने कहा, 'ऐसी रिपोर्ट्स तथ्यात्मक रूप से गलत हैं। हम अफवाहों और अटकलों पर और कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे।' आईवीएम इंडिया में 1.5 लाख कर्मचारी काम करते हैं। कंपनी हर साल एंप्लायीज को अप्रेजल देती है। सूत्रों ने बताया कि इस बार कंपनी खराब प्रदर्शन करने वाले एंप्लायीज का चुनाव बहुत सावधानी पूर्वक करेगी।

गौरतलब है कि आईटी कंपनियों में नौकरी ठेके की होती है और काम के घंटे अनंत होते हैं।वहां कामगारों के हक हकूक भी नहीं होते।ठेके का नवीकरण का मतलब नियुक्ति है।इसी रोशनी में इस पर गौर करें कि  इस बार कंपनी खराब प्रदर्शन करने वाले एंप्लायीज का चुनाव बहुत सावधानी पूर्वक करेगी।

आईबीएम की ही तर्ज पर सरकार का वादा है।गौरतलब है कि सरकार ने आज कहा कि IT सेक्‍टर ने उसे आश्वासन दिया है कि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छंटनी नहीं होगी और यह क्षेत्र 8-9 फीसदी की दर से वृद्धि कर रहा है।

आईटी सचिव अरूणा सुंदरराजन ने कहा कि कुछ ऐसे मामले हो सकते हैं, जहां कर्मचारियों की वार्षिक मूल्यांकन प्रक्रिया में कंपनियां उनके अनुबंध आगे न बढ़ाएं। इसके अलावा आईटी उद्योग में इस समय क्लाउड कम्‍प्यूटिंग, बिग डाटा और डिजिटल भुगतान व्यवस्था के उदय के बाद रोजगार का स्वरूप बदलाव से गुजर रहा है।अनुबंध ही नियुक्ति है और अनुबंध के नवीकरण न होने का मतलब छंटनी के अलावा और क्या होता है,सरकार इसका भी खुलासा कर दें।खबर यह है कि भारत में IT सेक्टर में जॉब जाने का खतरा लगातार मंडरा रहा है। ताजा खबर आईबीएम से आ रही है। सूत्रों की मानें तो आईबीएम इंडिया अगली कुछ तिमाही में 5000 एंप्लायीज की छंटनी कर सकता है। कंपनी के इस प्लान से परिचित सूत्रों ने हमारे सहयोगी ET NOW को बताया है कि दूसरी आईटी कंपनियों द्वारा इस तरह के कदम उठाने के बाद आईबीएम ने भी यह सख्त कदम उठाने का फैसला कर लिया है। आईटी कंपनियों का विश्लेषण है कि यह वित्त वर्ष आईटी सेक्टर के लिए चुनौतिपूर्ण होगा। इसके मद्देनजर आईटी कंपनियों ने एंप्लॉयीज की छंटनी का मन बना लिया है।रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि आईबीएम आने वाले क्‍वार्टर में अपने 5 हजार से ज्‍यादा कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है। परफॉर्मेंस रिव्‍यू के नाम पर छंटनी. यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब इन्‍फोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा जैसी आईटी कंपनियां छटनी की तैयारी कर रही हैं। ये कंपनियां परफॉर्मेंस रिव्‍यू करने में जुट गई हैं। इसी बीच आईबीएम की तरफ से भी छंटनी किए जाने की रिपोर्ट आई।

बहरहाल सरकार ने आईटी सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी का डर खारिज किया है। सरकार ने कहा है कि छंटनी की रिपोर्ट्स गलत और गुमराह करने वाली हैं। आईटी और टेलीकॉम सेक्रेटरी अरुणा सुंदरराजन ने मंगलवार को कहा कि आईटी इंडस्ट्री लगातार ग्रोथ कर रही है और सरकार इंडियन प्रोफेशनल्स के एच1बी वीजा के मुद्दे पर अमेरिकी अथॉरिटीज के लगातार संपर्क में है। इंडिया में वानाक्राई रैंसमवेयर साइबर अटैक के मुद्दे पर अरुणा ने कहा कि कई एजेंसियों के लोगों को मिलाकर एक टीम बनाई गई है, जो स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।

डिजिटल इंडिया के सुनहले सपने कितने खतरनाक हैं,कितने जहरीले हैं,सबकुछ जानने समझने का दावा करने वाले मीडिया के लोगों को भी इसका कोई अहसास नहीं है , जहां सबसे ज्यादा आटोमेशन हो गया है।मीडियाकर्मियों को वर्तमान के सिवाय न अतीत है और न कोई भविष्य और वे ही लोग डिजिटल इंडिया के सबसे बड़े समर्थक हैं।

बाकी बातें लिख लूं,इससे पहले चालू साइबर अटैक के नतीजे के बारे में आपको कुछ बताना जरुरी है।150 से देशों में रैनसम वायर का हमला हुआ है।एक खास कंपनी के आउटडेटेड प्रोग्राम में सहेजे गये तथ्य हाइजैक हो गये हैं।खास बात है कि भारत में तमाम बैंकिंग,शेयर बाजार,मीडिया, संचार,बीमा,ऊर्जा जैसे तमाम क्षेत्रों में उसी कंपनी के कार्यक्रम पर नेटवर्किंग हैं।

एटीएम से लेकर क्रेडिट डेबिट एटचीएम कार्ड भी उसीसे चलते हैं।अब भारत सरकार इस पूरी नेटवर्किंग का अपडेशन करने जा रही है।यानी उसी खास कंपनी के नये विंडो के साथ बचाव के तमाम साफ्टवेयर खरीदे जाने हैं।

इस पर कितना खर्च आयेगा,इसका हिसाब उपलब्ध नहीं है।जाहिर है हजारों करोड़ का न्यारा वारा होना है और इस साइबर अटैक की वजह से उसी कंपनी के विंडो, प्रोग्राम ,साफ्टवेयर, एंटी वायरस की नये सिरे व्यापक पैमाने पर मार्केटिंग होगी।

भारत के नागरिकों और करदाताओं ने डिजिटल इंडिया का विकल्प नहीं चुना है।कारपोरेट कंपनियों का मुनाफा बढ़ने के लिए श्रमिकों और कर्मचारियों के तमाम हक हकूक,कानून कत्ल कर देने के बाद आधार नंबर को अनिवार्य बनाकर आटोमेशन के जरिये रोजगार और आजीविका,कृषि,व्यापार और उद्योग से बहुंसख्य जनता को एकाधिकार कारपोरेट कंपनियों के हित में उन्हीं के प्रबंधन में आधार परियोजना लागू की गयी है।

अब तेरह करोड़ आधार और बैंक खातों की जानकारियां लीक होने के बाद सरकार ने कोई जिम्मेदारी लेने से सिरे से मना कर दिया है।ताजा ग्लोबल साइबर अटैक के बाद भारत सरकार इससे कैसे निपटेगी,वह मुद्दा अलग है,लेकिन तथ्यों की गोपनीयता की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठोने से उसने सिरे से मना कर दिया है और जो आधिकारिक अलर्ट जारी की है,उसके तहत तथ्यों की गोपनीयता,यानी जान माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी नागरिकों और करदाताओं पर डाल दी है।

इस पर तुर्रा यह कि मीडिया और सरकार दोनों की ओर से कंप्यूुटर और नेटवर्किंग की ग्लोबल एकाधिकार कंपनी के उत्पादों की साइबर अटैक के बहाने साइबर सुरक्षा के लिए मार्केटिंग की जा रही है कि आप कंप्यूटर और नेटवर्किंग को खुनद बचा सकते हैं तो बचा लें।इसमें होने वाले नुकसान की कोई जिम्मेदारी सरकार की नहीं होगी।

अबी ताजा जानकारी है कि 56 करोड़ ईमेल आईडी और उनका पासवर्ड लीक हो गया है।नेटवर्किंग में घुसने के लिए यह ईमेल आईडी और पासवर्ड जरुरी है।नेट बैंकिंग भी इसी माध्यम से होता है।डिजिटल लेनदेन से लेकर तमाम तथ्य और मोबाइल नेटवर्किंग और ऐप्पस भी इसीसे जुड़े हैं।अब आधार मार्फत लेनदेन मोबािल जरिये करने की तैयारी है।

इसका नतीजा कितना भयंकर होने वाला है,हम इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं।निजी कंपनियों और ठेका कर्मचारियों को हमने उंगलियों की जो छाप समेत अपने तमाम तथ्य सौंपे हैं,उसकी गोपनीयता की कोई गारंटी सरकार देने को तैयार नहीं है,जबकि सारी अनिवार्य सेवाओं से,बाजार और लेन देन से भी आधार नंबर को जोड़ दिया गया है।जिसके डाटाबेस सरकार और गैरसरकारी कंप्यूटर नेटवर्क में है।जैसे कि तेरह करोड़ एकाउंट के लीक होने के बाद भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में खुलासा भी किया कि यह सरकार पोर्टल से लीक नहीं हुआ।

प्राइवेट नेटवर्क में जो डाटाबेस है,जाहिर है कि उसकी लीकेज की कोई जिम्मेदारी भारत सरकार भविष्य में भी उठाने नहीं जा रही है।

रोजगार सृजन हो नहीं रहा है और डिजिटल इंडिया की मुक्तबाजार व्यवस्था में रोजगार और आजीविका दोनों खत्म होने जा रहे हैं।

हिंदू राष्ट्र में किसानों की आमदनी दोगुणा बढाने के दावे के बावजूद तीन साल में कृषि विकास दर 1.6 फीसद से ज्यादा नहीं बढ़ा है ,जबकि किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की दर में तेजी से इजाफा हो रहा है।

रोजगार विकास दर न्यूनतम स्तर पर है।केंद्र में मोदी सरकार को तीन साल पूरे हो चुके हैं, कई क्षेत्र में सरकार का दावा है कि उसने काम किया है।

बिजली उत्पादन, सड़क निर्माण से लेकर कई विभाग में बड़े कामों का केंद्र सरकार ने दावा किया है, लेकिन इन सबके बीच सरकार के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह कि पिछले तीन सालों में बेरोजगारी बड़ी संख्या में बढ़ी है।

लोगों को रोजगार देने में मौजूदा केंद्र सरकार तकरीबन विफल रही है और आज भी देश के युवा रोजगार की तलाश में यहां वहां भटक रहे हैं और एक अदद अच्छे दिन की तलाश कर रहे हैं। आठ साल के सबसे निचले स्तर पर रोजगार सृजन।

गौरतलब है कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2015 और साल 2016 में क्रमशः 1.55 लाख और 2.31 लाख नई नौकरियां उपलब्ध हुईं थी।

ये आंकड़े रोजगार के 8 प्रमुख क्षेत्रों टेक्सटाइल, लेदर, मेटल, ऑटोमोबाइल के 1,932 यूनिट के अध्ययन पर आधारित थे। 2009 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 10 लाख नई नौकरियां तैयार हुई थीं।

वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार हैं जो नई नौकरियां तैयार नहीं कर पाई है। दरअसल, भारत में बहुत बड़े वर्ग को रोजगार देने वाले आईटी सेक्टर में हजारों युवाओं की छंटनी हो रही है।

नरेंद्र मोदी सरकार अपने तीन साल पूरे होने का जश्न मनाने की तैयारी में है, वहीं देश में नए जॉब्स की संभावनाओं को लेकर जारी एक रिपोर्ट ने सभी को चिंता में डाल दिया है।

पिछले आठ साल का रिकॉर्ड देखें तो रोजगार लगातार घट रहे हैं और 2016 में तो यह आंकड़ा सबसे नीचे पहुंच गया। ऊपर से यह आशंका भी है कि आने वाला समय कहीं ज्यादा मुश्किलों भरा रह सकता है। टेलिग्राफ के अनुसार, 2016 में महज 2.31 लाख नई नौकरियां पैदा हुई हैं।

नए रोजगार का आकंड़ा 2009 के बाद से लगातार गिर रहा है। आठ प्रमुख सेक्टर्स की बात करें तो 2009 में 10.06 लाख लोगों को नौकरी मिली थी।

छंटनी का आलम इतना भयंकर है कि आउटसोर्सिंग आधारित आईटी को शिक्षा और रोजगार का फोकस बनाकर विश्वविद्यालयों,ज्ञान विज्ञान,उच्चशिक्षा और शोद को तिलाजंलि देकर डिजिटल इंडिया में विकास का इंजन जिस सूचना तकनीक को बना दिया गया,वहां युवाओं के हाथ पांव काट देने के पुख्ता इंतजाम हो गये हैं।

देश में बड़ी संख्या में रोजगार देने वाले इन्फ़र्मेशन टेक्नॉलजी सेक्टर में छंटनी की आशंका से देश के उन शहरों में रियल एस्टेट कंपनियों की चिंता बढ़ गई है जिन्हें आईटी हब कहा जाता है। रेजिडेंशल प्रॉपर्टी की सेल्स में हाल के समय में तेजी आई है, लेकिन अगर आईटी कंपनियों में छंटनी का दौर चलता है तो बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नै और गुड़गांव सहित कई बड़े शहरों में प्रॉपर्टी मार्केट में मंदी आ सकती है। नाइट फ्रैंक इंडिया के चीफ इकनॉमिस्ट और नैशनल डायरेक्टर सामंतक दास ने कहा, 'रेजिडेंशल प्रॉपर्टी मार्केट काफी हद तक सेंटीमेंट से चलता है।

बहरहाल आईटी कंपनियों में छंटनी का शिकार हुए कर्मचारी अब इन कंपनियों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। इसके लिए उन्होंने ऑनलाइन आईटी विंग बनाया है, जिससे रोजाना सैकड़ों की तादाद में वो आईटी कर्मचारी जुड़ रहे हैं, जिन्हें कंपनियों ने नौकरी से निकाल दिया है। अप्रेजल का ये सीजन आईटी इंप्लॉईज के लिए बुरा सपना क्यों साबित हो रहा है।

आईटी सेक्टर में आने वाले समय में छंटनी की संभावनाओं को देखते हुए चेन्नै में एंप्लॉयीज यूनियनें सॉफ्टवेयर प्रफेशनल्स को एक होने के लिए कह रही हैं। बढ़ते ऑटोमेशन और आउटसोर्सिंग के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में बढ़ रहे विरोध के चलते आईटी सेक्टर में छंटनी की संभावना है। तमिलनाडु में करीब चार लाख आईटी प्रफेशनल्स काम करते हैं। यहां पर ज्यादातर मिडिल लेवल के मैनेजरों को नौकरी से निकाले से जाने के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के अनुभवों से उत्साहित ट्रेड यूनियनों को लग रहा है कि आईटी सेक्टर में इस सेक्टर के जैसा भाव लाना आसान नहीं है।

कोलकाता के दीप्तिमान सेनगुप्ता ने 2011 में सीनियर सिस्टम एनालिस्ट के रूप में दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी आईबीएम में काम शुरू किया था। अच्छे परफॉर्मेंस की वजह से वो 2013 में  बेस्ट इंप्लाई भी बने। लेकिन पिछले साल ये कंपनी की नॉन-परफॉर्मर लिस्ट में शामिल हुए और अब इन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

दीप्तिमान की ही तरह कैपजैमिनी के ईशान बनर्जी को भी छंटनी का शिकार होना पड़ा।

आईटी कंपनियों के ये सारे कर्मचारी अब एकजुट हो रहे हैं। उन्होंने न्यू डेमोक्रैट्स डॉट कॉम वेबसाइट पर आईटी विंग बनाया है, जिसमें आईटी कंपनियों की छंटनी का शिकार हुए कर्मचारी जुड़ रहे हैं। अब 18 मई को डेमोक्रेटिक वन के सभी सदस्य मल्टीनेशनल कंपनियों के खिलाफ आगे की रणनीति तैयार करेंगे।

एक्जीक्यूटिव सर्च फर्म हेडहंटर्स इंडिया का अनुमान है कि अगले 3 सालों में देश में आईटी कंपनियों में पौने दो लाख से दो लाख तक कर्मचारियों की छंटनी हो सकती है। हालांकि आईटी कंपनियों की संस्था नैसकॉम छंटनी की आशंका से इनकार कर रही है।

दरअसल, आईटी सेक्टर में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का चलन बढ़ने की वजह से लोगों की जरूरत कम होती जा रही है। वहीं ग्लोबल इकोनॉमी में मंदी जारी रहने का असर आईटी सेक्टर की कंपनियों की ग्रोथ पर भी दिखने लगा है।

वहीं इस पर आइटी सेक्रटरी अरूणा सुंदराजन का कहना है कि, आइटी सेक्टर में बड़े पैमाने पर नौकरियां नहीं गई हैं। अरूणा सुंदराजन ने आगे कहा कि आईटी सेक्टर पर कोई बड़ा संकट नहीं है और इसका डाटा मंत्रालय के पास है। सेक्टर की स्थिति सामान्य है।

Monday, May 15, 2017

जाति के सच का मतलब इसके सिवाय कुछ और नहीं हो सकता कि हम जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के मिशन के तहत चलकर समता और न्याय का रास्ता चुनें जिसके लिए मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण अनिवार्य है,जिसे जाति का अंत हो और निरंकुश फासीवादी रंगभेदी नस्ली कारपोरेट मजहबी सत्ता का तख्ता पलट हो। जाहिर है कि अस्मिता राजनीति को खत्म किये बिना हम मजहबी सियासत के शिंकजे से न आम जनता और न इस मुल्क को रिहा क�

जाति के सच का मतलब इसके सिवाय कुछ और नहीं हो सकता कि हम जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के मिशन के तहत चलकर समता और न्याय का रास्ता चुनें जिसके लिए मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण अनिवार्य है,जिसे जाति का अंत हो और निरंकुश फासीवादी रंगभेदी नस्ली कारपोरेट मजहबी सत्ता का तख्ता पलट हो।

जाहिर है कि अस्मिता राजनीति को खत्म किये बिना हम मजहबी सियासत के शिंकजे से न आम जनता और न इस मुल्क को रिहा कर सकते हैं।इसके लिए जाहिर है कि राजनीति के अंक गणित, बीज गणित,रेखा गणित, सांख्यिकी और त्रिकोणमिति, भौतिकी और रसायनशास्त्र को सिरे से बदलना होगा।  

पलाश विश्वास

कल रात प्रबीर गंगोपाध्याय की किताब जनसंख्या की राजनीति के हिंदी अनुवाद की पांडुलिपि उन्हें भेज दी है। फिलहाल मेरे पास अनुवाद का कोई काम नहीं है। आजीविका और आवास की समस्याओं में बेतरह उलझा हुआ हूं। ये समस्याएं इतनी जटिल हैं कि जल्दी सुलझने के आसार नहीं है।वैसे भी देश में इस वक्त सबसे बड़ा संकट आजीविका और रोजगार का है। डिजिटल इंडिया में युवाओं के लिए संगठित और असंगठित क्षेत्र में कोई रोजगार नहीं है तो मीडिया से बाहर निकलने के बाद नये सिरे से अपने पांवों पर खड़ा होना बहुत मुश्किल है,खासकर तब जब आपके लिए सर छुपाने की कोई जगह नहीं बची है।

इस बीच बुद्ध जयंती के अवसर पर दक्षिण कोलकाता के गड़िया में बंगाल के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से संवाद की स्थिति बनी है।उधर हमारे पुराने मित्र विद्याभूषण रावत ने वह वीडियो भी जारी कर दिया,जिसमें यूपी के चुनाव से पहले के हालत पर हमने चर्चा की थी।

कुछ मुश्किल सवाल रावत ने पूछे थे,जिसके जबवा शायद हम कायदे से दे नहीं सके हैं।गड़िया में जिन कार्यकर्ताओं से संवाद की स्थिति बनी है और बाकी देश के जिन मित्रों और साथियों से बात होती रहती है,उनके सवालों के जबाव भी हमारे पास नहीं है।

इस बीच दो बार हमारे प्रबुद्ध मित्र डाक्टर आनंद तेलतुंबड़े से बी बात होती रही है।उनसे भी इस बारे में चर्चा होती रही है।

घनघोर संकट है।चारों तरफ नजारा कटकटेला अंधियारा का है।

सवाल फिर जाति और वर्ग का है।

जैसा कि हम बार बार लिखते रहे हैं और बोलते रहे हैं,मेहनतकशों के वर्गीय ध्रूवीकरण के सिवाय इस गैस चैंबर से निकलने का कोई रास्ता नहीं है।

जाति के जटिल यथार्थ को जानते हुए हम ऐसा कह लिख रहे हैं।

जाति की समस्या को सुलझाये बिना,जाति को सिरे से खत्म किये बिना बदलाव की कोई सूरत नहीं बन सकती,यह सबसे बड़ी चुनौती यकीनन है।जिसे बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर पहले ही साफ कर चुके हैं।

जाति व्यवस्था की संरचना को देखें तो बहुसंख्यक आम जनता, खासकर मेहनतकश तबके के लोग ,किसान, खेतिहर मजदूर, कृषि और प्रकृति से जुड़े तमाम समुदाय, असंगठित मजदूर और शरणार्थी दलित, पिछड़े हैं।

आदिवासी जाति व्यवस्था के अंतर्गत नहीं हैं लेकिन बाकी जनता से अलगाव की हालत में उनकी हालत सबसे खराब है।उसी तरह अल्पसंख्यकों की सामाजिक आर्थिक स्थिति भी दलितों से बेहतर नहीं है।

दूसरी ओर यह भी सच है कि जाति व्यवस्था के मुताबिक जो वर्चस्ववादी और कुलीन जातियां है, वही आर्थिक राजनीतिक सत्ता के अधिकारी हैं।उनका  ही मुक्तबाजार और एकाधिकार वर्चस्व का सत्ता वर्ग है और अस्मिता की राजनीति के तहत जातियाों को लगातार मजबूत बनाते हुए हम उनसे लड़ नहीं सकते।

हम बताना चाहते हैं कि बामसेफ से अलग हो जाने के बाद देश भर के अंबेडकरी कार्यकर्ताओं के साथ हम लोगों ने अंबेडकरी आंदोलन के एकीकरण की कोशिश बामसेफ एकीकरण अभियान के तहत किया था।जिसके लिए देशभर के अंबेडकरी कार्यकर्ताओं के तीन सम्मेलन मुंबई,नागपुर और भोपाल में हुए थे।

नागपुर और मुंबई का सम्मेलन खुला था,जिसमें हमारे और दूसरे साथियों के वक्तव्य यूट्यूब पर उपलब्ध हैं।

मुबंई और नागपुर के दोनों सम्मेलनों में यह आम राय बनी थी कि अंबेडकरी आंदोलन का दायरा तोड़ना होगा और इसे अस्मिता की राजनीति से बाहर निकालना होगा। यह भी तय हो गया था कि विमर्श की भाषा लोकतांत्रिक होगी, जिसमें सभी तबकों को संबोधित किया जायेगा।

विभिन्न संगठनों का संघीय ढांचा बनाकर एकीकृत अंबेडकरी आंदोलन के मिशन पर तमाम लोग सहमत थे।अंबेडकरी आंदोलन को संगठनात्मक तौर पर लोकतांत्रिकऔर संस्थागत  बनाने पर भी आम सहमति हो गयी थी।

यह तय हुआ था कि व्यक्ति निर्भर संगठन की बजाये हम संस्थागत जाति वर्चस्व की राजीति के मुकाबले संस्थागत आंदोलन और संगठन चलायेंगे। लेकिन संस्था के निर्माण के मुद्दे पर भोपाल में हुए सम्मेलन में गहरे मतभेद आ गये क्योंकि नागपुर और महाराष्ट्र के कुछ साथी नई संस्था पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे जिससे वह अभियान स्थगित हो गया।

वे भी किसी खास जाति के ही लोग थे।जिनकी गरज बाबासाहेब के मिशन से बेहद ज्यादा अपनी ही जाति के वर्च्सव को बनाये रखने को लेकर थी,जिसके तहत उन्होंने अंबेडकरी विचारधारा और आंदोलन का बेड़ा गर्क करते हुए उसका हिंदुत्वकरणा कर दिया है।उनकी वजह से अब अंबेडकरी आंदोलन पर किसी विमर्श की भी गुंजाइश नहीं है।जाति वर्चस्व के लिए भारत में साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा और आंदोलन की भी वही गति और नियति हैं।

इस चर्चा का हवाला देना इसलिए जरुरी है कि अंबेडकरी आंदोलन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भी मानने लगे हैं कि जाति आधारित पहचान के साथ किसी संगठन और आंदोलन से बदलाव की कोई संभावना नहीं बनती और इससे आखिर जातिव्यवस्था को ही वैधता मिलती है और वह मजबूत होती है, जो समता और न्याय पर आधारित समाज और राष्ट्र के निर्माण के अंबेडकरी मिशन और अंबेडकरी विचारधारा के खिलाफ है।

कई साल हो गये।हम फिर पुराने साथियों को जोड़ नहीं सके हैं और न यह विमर्श चालू रख सके हैं।

इसके विपरीत दुनियाभर में जहां भी राष्ट्र और समाज में परिवर्तन हुए हैं,वह अस्मिता तोड़कर मेहनतकश आवाम की गोलबंदी से हुई है।उनका वर्गीय ध्रूवीकरण हुआ है।

चर्च की दैवी सत्ता के खिलाफ पूरे यूरोप में किसानों के आंदोलन, फ्रांसीसी क्रांति, अमेरिका की क्रांति से लेकर रूस और चीन की क्रांति के साथ साथ आजादी से पहले भारतीय जनता के संयुक्त मोर्चे के तहत स्वतंत्रता संग्राम और उसके नतीजतन भारत की आजादी इसके उदाहरण हैं।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ अश्वतों के आंदोलन को भी ङम अस्मिता आंदोलन नहीं कह सकते और न लातिन अमेरिकी देशों में निरंतर जारी बदलाव के संघर्ष में अस्मित राजनीति की कोई जगह है।

हालांकि राष्ट्र का चरित्र अब भी सामंती औपनिवेशिक है।लेकिन राष्ट्र अब निरंकुश सैन्य राष्ट्र  है और अर्थव्यवस्था से उत्पादकों का, मेहनतकशों और किसानों से लेकर छोटे और मंझौले कारोबारियों,छोटे और मंझौले उद्योगपतियों को या निकाल फेंका गया है या हाशिये पर रखा दिया गया है और सत्ता वर्ग के साथ संसदीय राजनीति कारपोरट पूंजी से नियंत्रित होती है।

सत्ता रंगभेदी है और फासिस्ट है।

यह सत्ता भी निरंकुश है जो दमन और उत्पीड़न के साथ साथ रंगभेदी नरसंहार के तहत आम जनता को कुचलने से परहेज नहीं करती।

समूचा राजनीतिक वर्ग करोड़पति अरबपति हो जाने से लोकतंत्र में आम जनता का वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

जिस संविधान की बात हम करते हैं,वह कहीं लागू नहीं है।

कानून का राज अनुपस्थित है।

समता और न्याय का लक्ष्य तो दूर की बात देश का लोकतांत्रिक संघीय ढांचा टूटने लगा है और आम जनता जाति,धर्म,नस्ल,भाषा और क्षेत्र की विविध अस्मिताओं के तहत बंटी हुई है।

भारत का विभाजन इसी अस्मिता राजनीति के तहत हुआ है और अस्मिता राजनीति के तहत राष्ट्र के रुप में हम खंड खंड हैं।

सबका अपना अलग अलग राष्ट्र है।

अस्मिता राजनीति के तहत धार्मिक ध्रूवीकरण की राजनीति ही अब राजनीति हो गयी है।जनसंख्या के हिसाब से इस देश में विभाजनपूर्व भारत की तरह अब भी दो बड़ी राष्ट्रीयताएं एक दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंद हैं,हिंदू औकर मुसलमान और हकीकत यह है कि बाकी तमाम अस्मिताएं इन्हीं दो राष्ट्रीयताओं से नत्थी हो गयी है।

इनमें से हिंदू अस्सी फीसद या उससे ज्यादा हैं तो मुसलमान सिर्फ सत्रह प्रतिशत।अल्पसंख्यक होने की वजह से मुसलमान गहन असुरक्षाबोध और नस्ली नरसंहार के राजकाज और राजनीतिक की वजह से बेहतर सामाजिक राजनीतिक और पर बेहतर संगठित है लेकिन आर्थिक हैसियत और रोजगार के मामले में वे कही नहीं है।विविधता और बहुलता का लोकतंत्र और सहिष्णुता का अमन चैन गायब हैं।

आदर्श की बात रहने दें, धार्मिक अस्मिता अंततः निर्णायक होती है।जातियां छह हजार से ज्यादा है और कोई एक जाति भी संगठित नहीं है।

उनमें उपजातियों और गोत्र के नाम गृहयुद्ध है।

संविधान कानूनी हक हकूक पाने में मददगार है जो कहीं लागू नहीं है।जो जातियां अलग अलग भी संगठित नहीं हैं,बाबासाहेब के सौजन्य से तीन श्रेणियों में अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और पिछड़े बतौर भी वे संगठित नहीं हो सके हैं।

सत्ता में हिस्सेदारी भी अलग अलग बाहुबलि ,वर्चस्ववादी,मजबूत जातियों को मिलती रही हैं और बाकी जातियों के लोग तमाम हकहकूक से वंचित रहे हैं।

तो जाहिर है कि जाति चाहे जितनी मजबूत हो,वे दूसरी कमजोर जातियों को दबायेंगे और सारी मलाई खाकर दूसरों को भूखों प्यासा मार देंगी।

इससे कमजोर जातियों और समुदायों,यहां तक कि धार्मिक समुदायों के लिए भी सबसे बड़ी बहुसंख्य अस्मिता की शरण में जाने के सिवाय कोई रास्ता बचता नहीं है।

एक प्रतिशत से कम या उससे थोड़ा ज्यादा जनसंख्या वाले बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म,जैन धर्म और सिख धर्म का उसीतरह हिंदुत्वकरण हो गया है ,जैसे दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का।

इनमें से किसी वर्ग का मुसलमानों से कोई साझा मोर्चा बन नहीं सका है,क्योंकि अस्सी फीसद हिंदुओं के मुकाबले मुसलमान सिर्फ सत्रह प्रतिशत हैं।

जाहिर सी बात है कि लोकतंत्र में बहुमत के साथ नत्थी हो जाने पर अस्मिता राजनीति को सत्ता में हिस्सेदारी मिल सकती है।

क्योंकि भारत में अस्मिता राजनीति अंततः धर्म राष्ट्रीयता बन जाती है।

सीधे तौर पर हिंदुत्व बनाम इस्लाम।

यही ध्रूवीकरण भारत विभाजन का आधार रहा है और आजादी के बाद पिछले सात दशकों में राजनीति कुल मिलाकर इसी ध्रूवीकरण की राजनीति है,जिससे मुसलमानों की हैसियत में कोई बदलाव नहीं हुआ और वे बलि के बकरे बना दिये गये हैं तो दूसरी तरफ हिंदुत्व की राजनीति ही सत्ता की राजनीति रही है, इस राजनीति में छह हजार से ज्यादा जातियां, अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय बौद्ध,ईसाई,सिख,जैन सारे के सारे नत्थी हो गये।

हिंदुत्व की राजनीति इसीलिए अपराजेय हो गयी है।

अस्मिता राजनीति में हिंदुत्व की विचारधारा का मुकाबला जातियां नहीं कर सकतीं और न अति अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के हित हिंदुत्व से जुड़े बिना सुरक्षित हो सकती है। बल्कि हिंदुत्व जाति और जाति व्यवस्था से निरंतर मजबूत होता है।

जाति को मान लेने का मतलब ही यह हुआ कि आप चाहे ब्राह्मणवाद,ब्राह्मण धर्म और जाति बतौर ब्राह्मणों की कितना ही विरोध करें,आप मनुस्मृति के विधानके मुताबिक चल रहे हैं।

रोजमर्रे की जिंदगी में भी तमाम जातियां हिंदुत्व के विविध संस्कार,नियम और विधि का पालन करती हैं।

जाति के सच का मतलब इसके सिवाय कुछ और नहीं हो सकता कि हम जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के मिशन के तहत चलकर समता और न्याय का रास्ता चुनें जिसके लिए मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण अनिवार्य है,जिसे जाति का अंत हो और निरंकुश फासीवादी रंगभेदी नस्ली कारपोरेट मजहबी सत्ता का तख्ता पलट हो।

जाहिर है कि अस्मिता राजनीति को खत्म किये बिना हम मजहबी सियासत के शिंकजे से न आम जनता और न इस मुल्क को रिहा कर सकते हैं।इसके लिए जाहिर है कि राजनीति के अंक गणित,बीज गणित,रेखा गणित,सांख्यिकी और त्रिकोणमिति, भौतिकी और रसायनशास्त्र के सिरे से बदलना होगा।  

Sunday, May 14, 2017

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख गर्भ चीरने वाले बन गए, मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

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