BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Sunday, June 16, 2013

क्या जमीन पर उतर पाएगा तीसरे मोर्चे का ख्वाब

क्या जमीन पर उतर पाएगा तीसरे मोर्चे का ख्वाब

Sunday, 16 June 2013 10:37

विवेक सक्सेना 
नई दिल्ली । राजग संयोजक शरद यादव की अपनी पार्टी जद (एकी) आज के दौर में भाजपा से अलग होकर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए उत्साहित है। दूसरी तरफ, सच्चाई यह है कि वे खुद यह मानते हैं कि इस देश में इस तरह के मोर्चे का कोई भविष्य नहीं है। भाजपा पर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए दबाव बनाने वाला जद (एकी) क्या यह तय कर पाएगा कि तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा? 
सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान पाने वाले जयप्रकाश नारायण के करीबी व जद (एकी) अध्यक्ष शरद यादव का दिल राजग से अलग होकर तीसरा मोर्चा बनाए जाने को लेकर शायद ज्यादा खुश नहीं होगा। ऐसा मानने की वजह यह है कि वे सिद्धांत: इसके खिलाफ रहे हैं। कुछ महीने पहले ही तीसरे मोर्चे की संभावना को लेकर उन्होंने 'जनसत्ता' से बातचीत में जो विचार जताए थे उनका एक बार फिर जिक्र करना जरूरी हो जाता है।
शरद यादव ने कहा था कि इस देश में न तो तीसरे मोर्चे की कोई संभावना है और न ही उसका कोई भविष्य है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। इस देश की राजनीति दो ध्रुवीय हो चुकी है। एक ध्रुव कांग्रेस है तो दूसरा भाजपा है। बाकी दलों को ग्रहों की तरह इनमें से किसी न किसी एक ध्रुव के साथ रहना होगा। तीसरे मोर्चे के बारे में उनका अपना आकलन यह रहा कि इस संबंध में अब तक किए गए सारे उपाय फेल रहे हैं। जब संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण व वीपी सिंह के बनाए गए तीसरे मोर्चे के प्रयोग विफल रहे तो और कोई कैसे सफल हो सकता है।
इस बार यह पहल ममता बनर्जी के फैडरल फ्रंट के रूप में की जा रही है। उनकी जद (एकी) नेता नीतीश कुमार, ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से बात शुरू हो चुकी है। सपा व दूसरे दलों के साथ भी संभावना तलाशी जा रही है। हो सकता है कि निकट भविष्य में वाइएसआर कांग्रेस, तेदेपा, बसपा आदि दलों से भी बात हो।
यह कोशिश की जा रही है कि इस बार भी गैर कांग्रेस व गैर भाजपा गठबंधन बनाया जाए। हर चुनाव के पहले जब तीसरे मोर्चे की बात चलती है तो कांग्रेस व भाजपा उसके लिए सांपनाथ व नागनाथ हो जाते हैं। नतीजे आने के बाद ये क्षेत्रीय दल उन्हें मिले जनमत के आधार पर उनका भ्रष्टाचार या सांप्रदाकिता के मुद्दे पर समर्थन देते या विरोध करते हैं। तीसरे मोर्चे की संभावना से ज्यादा उसे लेकर आशंकाएं कहीं ज्यादा नजर आती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके गठन में जिन दलों के साथ आने की संभावना है व जिन राज्यों में उनका प्रभाव या सरकारें हैं वहां से लोकसभा सीटों की कुल संख्या भी 272 नहीं बनती हैं। ध्यान रहे कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए इतना बहुमत हासिल करना जरूरी है। 

यहां एक बड़ा सवाल यह भी पैदा होता है कि जिन राज्यों में जो क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं क्या उन्हें लोकसभा चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल का सामना नहीं करना पड़ेगा? बिहार में जद (एकी), पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस,ओड़िशा में बीजद, उत्तर प्रदेश में सपा सत्ता में है। क्या वह कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपनी सरकार की खामियां छुपा पाने में कामयाब हो जाएंगे?
यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि पश्चिम बंगाल में ममता साथ आती हैं तो उनके धुर विरोधी वाम मोर्चे का क्या होगा? उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा कैसे साथ आएंगी? बिहार में अगर नीतीश साथ आते हैं तो लालू यादव व पासवान का क्या होगा ? वे भी सेक्युलर वोटों के आढ़ती माने जाते हैं। तमिलनाडु में द्रमुक व अन्ना द्रमुक में से तीसरे मोर्चे में कौन शामिल होगा? आंध्र प्रदेश में यह मोर्चा तेदेपा व वाइएसआर कांग्रेस में से किसे अपना साथी चुनेगा?
यहां यह भी याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि जब कांग्रेस राहुल गांधी व मनमोहन सिंह को आगे कर, भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार बता कर चुनाव लड़ रही होंगी तो तीसरे मोर्चे का उम्मीदवार कौन होगा। 
कहीं इस सवाल पर ही मोर्चा बनने के पहले ही न बिखर जाए, क्योंकि उसके जितने भी नेता हैं वे बेहद महत्त्वाकांक्षी हैं। सभी प्रधानमंत्री पद के सपने देख रहे हैं। जबकि उनकी अपील उनके अपने राज्यों तक ही सीमित है। वे एक-दूसरे पर कितना भरोसा करते हैं यह उनका रिकार्ड ही बता देता है। सपा नेता मुलायम सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर वाम दलों को व ममता को राष्ट्रपति पद के चुनाव में व एफडीआइ के मुद्दे पर कैसा गच्चा दिया था सब उससे परिचित हैं। अगर यह मोर्चा बनता है तो उसकी नींव आपसी अविश्वास पर रखी जाएगी जिसे हिलाते रहने के लिए नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं और कुंठाएं काम करती रहेंगी।
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/1-2009-08-27-03-35-27/47038-2013-06-16-05-08-25

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