BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Thursday, May 9, 2013

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली?

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली?


 आमुखनज़रियापुस्‍तक मेलामीडिया मंडीमोहल्ला दिल्ली

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली?

9 MAY 2013 ONE COMMENT

Book Launch and Discussion: Hindi Mein Samachar

♦ अरविंद दास

80के दशक में राजेंद्र माथुर, सुरेंद्र प्रताप सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसी भाषा का प्रयोग शुरू किया था, जिसकी पहुंच बहुसंख्यक हिंदी पाठकों तक थी। बकौल प्रभाष जोशी, "हमारी इंटरवेंशन से हिंदी अखबारों की भाषा अनौपचारिक, सीधी, लोगों के सरोकार और भावनाओं को ढूंढने वाली भाषा बनी। हमने इसके लिए बोलियों, लोक साहित्य का इस्तेमाल किया।"[1] लेकिन यही बात वर्तमान में सुर्खियों की भाषा के प्रसंग में नहीं कही जा सकती है। आज सुर्खियों की भाषा भले ही अनौपचारिक हो उसमें हिंदी की बोलियों के शब्दों की जगह तेजी से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। मसलन, ओके, नो मोर, पेटेंट, अजेंडा, फोटोग्राफ, टेंशन, फ्री, बैन आदि। स्पष्टतः ऐसा नहीं कि हिंदी में इन शब्दों का स्थानापन्न नहीं है या उनका पर्यायवाची नहीं मिलता बल्कि बेवजह इन शब्दों के इस्तेमाल का प्रचलन बढ़ रहा है।

इसी तरह एक-दो शब्द हीं नहीं बल्कि कभी-कभी तो पूरी की पूरी पंक्तियां हीं अंग्रेजी की होती हैं। जैसे – 'वन टू का फोर, फोर टू का वन', 'वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन', 'सेफ्टी का रेड सिग्नल', एमसीडी में घूसखोर अब 'नो मोर'… आदि। ऐसे में जो पाठक अंग्रेजी ज्ञान से वंचित हो, उसके लिए इन सुर्खियों का कोई मतलब नहीं रह जाता। अंग्रेजी के इन शब्दों के इस्तेमाल से जहां दुरूहता बढ़ी है, वहीं अखबारों की अभिव्यंजना क्षमता में बढ़ोतरी नहीं हुई है।

वर्तमान में खबरों की भाषा कई बार चौंकाने वाली होती है। जैसे आम तौर पर खबरिया चैनलों के बुलेटिन की भाषा होती है, जो सुनने वालों को तुरंत अपनी ओर खींचने की कोशिश करती दिखती है। कई बार खबरों की सुर्खियां और नीचे दिये गये समाचार का कोई मेल नहीं दिखता। यानी अखबारों की भाषा वस्तुनिष्ठ और अभिधापरक न होकर आत्मनिष्ठ और लक्षणा-व्यंजना प्रधान हो गयी है।

'गुरू गुड़ रह गया, मुंडा चीनी हो गया' या 'गांगुली की गिल्ली पर गुरू की गुगली' से खबर की प्रकृति या विषय का पता लगना निहायत ही मुश्किल है। इसी तरह 'हुआ वही जो 'राम' रचि राखा' में कौमा के अंदर प्रयुक्त राम राजनेता रामविलास पासवान को इंगित करता है और खबर बिहार की राजनीति से संबंधित है, जिसका पता पूरी खबर पढ़ने के बाद ही लगता है। 'समोसे में कम पड़ा आलू, खिचड़ी पकनी चालू' से खबर की प्रकृति नहीं बतायी जा सकती है, जबकि यह खबर राज्य विधानसभा चुनाव से संबंधित है। 'गड्डी जांदी ए छलांगा मार दी, कदी डिग ना जाए' तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा प्रस्तुत रेल बजट से संबंधित है।

स्पष्टतः जहां 80 के दशक में बजट और राजनीतिक सुर्खियों की भाषा और मनोरंजन से संबंधित सुर्खियों की भाषा में एक विभाजक रेखा मिलती है, वहीं वर्तमान में बजट और विधानसभा चुनाव जैसी महत्वपूर्ण सुर्खियों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने की पहल नयी है।

मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी (2000 : 100) हिंदी अखबारों की इस भाषा-शैली को जनसंचार के लिए उपयुक्त मानते हैं। 'हिंग्रेजी का समाजशास्त्र' लेख में वह लिखते हैं, "बाजार की शक्तियां और उनके सहयोगी माध्यम टीवी ने यह मसला सुलझा दिया है कि कौन सी भाषा जनसंचार में सक्षम है। जो सक्षम है वह बड़ी भाषा है। यह हिंदी है जिसे आप वर्णसंकर, भ्रष्ट, हिंग्रेजी कह सकते है।"[2] नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक बालमुकुंद (2006) 'यही लैंग्वेज है नये भारत की' लेख में इसी बदलाव की ओर इशारा करते हुए लिखते हैं, "किसी भाषा को बनाने का काम पूरा समाज करता है और उसकी शक्ल बदलने में कई-कई पीढ़ियां लग जाती हैं। लेकिन इस बात का श्रेय नवभारत टाइम्स को जरूर मिलना चाहिए कि उसने उस बदलाव को सबसे पहले देखा और पहचाना, जो पाठकों की दुनिया में आ रहा है। दूसरे अखबारों को उस बदलाव की वजह से नवभारत टाइम्स के रास्ते पर चलना पड़ा, यह उनके लिए चॉइस की बात नहीं थी।"[3] पर सवाल है कि हिंदी समाज का वह कौन सा वर्ग है, जो इस हिंग्रेजी या हिंग्लिश या भ्रष्ट भाषा अपना कर गौरवान्वित हो रहा है और जिसके प्रतिनिधित्व का दावा नवभारत टाइम्स कर रहा है?[4]

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाजार है। इस बाजार में हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों को ठूंस कर हिंदी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम आज चल रही है। हिंदी के अखबार इस मुहिम में अपना सहयोग 'हिंग्रेजी' के माध्यम से दे रहे हैं। कई अखबारों में हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का प्रयोग जोर पकड़ रहा है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि जो भाषा ठीक से 'राष्ट्रीय' ही नहीं बन पाई हो उसे 'अंतरराष्ट्रीय' बनाने की कोशिश की जा रही है ?

हिंदी के साथ शुरू से ही यह विडंबना रही है कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों और एक प्रभुत्वशाली वर्ग की निजी महत्वाकांक्षा के चलते कभी इसे उर्दू, कभी तमिल तो कभी अंग्रेजी के बरक्स खड़ा किया जाता रहा। स्वाभाविक हिंदी जिसे भारत की बहुसंख्यक जनता बोलती-बरतती है, का विकास इससे बाधित हुआ। राजभाषा हिंदी को वर्षों तक ठस्स, संस्कृतनिष्ठ, उर्दू-फारसी शब्दों से परहेज के तहत तैयार किया गया। डॉक्टर रघुवीर के द्वारा तैयार किया गया अंग्रेजी-हिंदी पारिभाषिक शब्दकोश जिसके उदाहरण हैं। इस प्रसंग में हिंदी के विद्वान वीर भारत तलवार (2002 : 387) ने नोट किया है, "हिंदी की पारिभाषिक शब्दावली बनाने के नाम पर एक भद्रवर्गीय ब्राह्मण ने जिस शब्दावली को तैयार किया – जिसे राज्य ने अपनी ताकत से लाद रखा है – उसे हिंदी की शब्दावली कहना मुश्किल है। वह हिंदी में से हिंदी के शब्दों को हटाकर जबरन गढ़े हुए संस्कृत शब्दों को ठूंसने का प्रयत्न है।"[5] आज भी सरकारी दफ्तरों में सारा काम काज अंग्रेजी में होता है और हिंदी में जो कुछ भी लिखा जाता है वह अंग्रेजी का अनुवाद भर होता है, जिसे समझने के लिए अंग्रेजी के मूल प्रति को पढ़ना अति आवश्यक हो जाता है।

देश की आजादी के बाद कागज पर भले ही राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिंदी का विशाल भवन तैयार किया जाता रहा, सच्चाई यह है कि हिंदी की जमीन लगातार इससे कमजोर होती गयी। राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा-राजभाषा की तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिंदी की हुई। 1960 के दशक में उत्तर भारत में 'अंग्रेजी हटाओ', और दक्षिण भारत में 'हिंदी हटाओ' के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई, इसे हिंदी कवि धूमिल (2002 : 96) ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था…

तुम्हारा ये तमिल-दुःख
मेरी यह भोजपुरी-पीड़ा का
भाई है
भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है [6]

20वीं सदी के आरंभिक दशकों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद से लड़ कर हिंदी ने समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के माध्यम से सार्वजनिक दुनिया में अपनी एक अहम भूमिका अर्जित की थी। इस दुनिया में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा संभव थी। करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में राष्ट्रभाषा हिंदी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी। उन्‍होंने हिंदी को स्वराज से जोड़ा। आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, सवर्ण प्रभुवर्ग जिनकी साठगांठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ थी, हिंदी की सार्वजनिक दुनिया पर काबिज होते गये। इससे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया किस कदर सिकुड़ती और आमजन से कटती चली गयी, इसे आलोक राय (2001) ने अपनी किताब 'हिंदी नैशनलिज्म'[7] में विस्तार से बताया है। हिंदी को ज्ञान और विमर्श की भाषा बनाने के बजाय महज बोल-चाल के माध्यम तक ही सीमित रखने का कुचक्र एक बार फिर हिंदी के अखबारों, खबरिया चैनलों के माध्यम से चल रहा है।

भाषा महज अभिव्यक्ति का साधन नहीं है। भाषा में मनुष्य की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना अभिव्यक्त होती है। समय के साथ होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों की अनुगूंज भाषा में भी सुनाई पड़ती है। भूमंडलीकरण के बाद हिंदी के अखबारों में भाषा का रूप जितनी तेजी से बदला है, उतनी तेजी से हिंदी मानस की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना नहीं बदली है। फलतः यह बदलाव अनायास न होकर सायास है। आलोचक रामविलास शर्मा (2002 : 431) ने ठीक ही नोट किया है, "समाज में वर्ग पहले से ही होते हैं। भाषा में कठिन और अस्वाभाविक शब्दों के प्रयोग से वे नहीं बनते किंतु इन शब्दों के गढ़ने और उनका व्यवहार करने के बारे में वर्गों की अपनी नीति होती है।"[8] एक खास उभर रहे उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर इस तरह की भाषा (हिंग्रेजी) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शहरी नव धनाढ्य वर्ग है जिसकी आय में अप्रत्याशित वृद्धि भूमंडलीकरण के दौर में हुई है। यही वर्ग खुद को इस भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है। इस वर्ग में हिंदी क्षेत्र के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, स्त्री, दलित एवं आदिवासी नहीं आते।

[1] निजी इंटरव्यू, दिल्ली, 15 जून 2008

[2] सुधीश पचौरी (2000), "हिंग्रेजी का समाजशास्त्र", पुरूषोत्तम अग्रवाल और संजय कुमार (सं.) "हिंदी नयी चाल में ढली : एक पुनर्विचार" में संग्रहित, नयी दिल्ली, देशकाल प्रकाशन

[3] नवभारत टाइम्स, दिल्ली, 14 नवंबर 2006 और बालमुकुंद (2006) विदुर (सं) अन्नू आनंद "हिंदी अखबारों की बदलती भाषा", दिल्ली, अक्टूबर-दिसंबर

[4] परिशिष्ट-1

[5] वीर भारत तलवार (2002), "रस्साकशी", दिल्ली : सारांश प्रकाशन

[6] धूमिल (2002), "संसद से सड़क तक", नयी दिल्ली : राजकमल प्रकाशन

[7] आलोक राय (2001), "हिंदी नैशनलिज्‍म : ट्रैक्टस फॉर द टाइम्स", नयी दिल्ली : संगम बुक्स

[8] राम विलास शर्मा (2002), "भाषा और समाज" नयी दिल्ली : राजकमल प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन से छपी अरविंद दास की पुस्‍तक हिंदी में समाचार का एक छोटा सा हिस्‍सा

(अरविंद दास। देश के उभरते हुए सामाजिक चिंतक और यात्री। कई देशों की यात्राएं करने वाले अरविंद ने जेएनयू से पत्रकारिता पर भूमंडलीकरण के असर पर पीएचडी की है। IIMC से पत्रकारिता की पढ़ाई। लंदन-पेरिस घूमते रहते हैं। दिल्ली केंद्रीय ठिकाना। भूमंडलीकरण के बाद की हिंदी पत्रकारिता पर हिंदी में समाचार नाम की पुस्‍तक प्रकाशित। उनसे arvindkdas@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

http://mohallalive.com/2013/05/09/a-little-part-of-news-in-hindi-2/

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