BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Saturday, July 14, 2012

जातिवादी पूर्वाग्रहों से जूझती 'शुद्र-द राइजिंग'

http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/2011-06-03-11-46-05/2866-jativadi-purvagrahon-se-jhoojhtee-shudra-the-rising-sanjeev-jaisawal

शुद्र-द राइजिंग फिल्म को जल्द से जल्द देश में प्रदर्शित करने की योजना है, लेकिन सिनेमा के माध्यम से खामोश क्रांति का सपना देखने वाले संजीव जायसवाल, खुद इसका शिकार होने से नहीं बच पाए. ज्यादातर सिनेमा घरों के मालिकों ने फिल्म को रिलीज करने से मना कर दिया है...

पंकज कुमार

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हरियाणा के भगाणा गांव के सैकड़ों अद्र्धनग्न शुद्रों की आवाज भले ही लुटियन जोन में रहने वाले अनसुना कर रहे हो, लेकिन उसी लुटियन जोन में रायसीना हिल्स के करीब फिल्म डिवीजन आडिटोरियम में सदियों से दलितों को अछूत बनाए रखने की ऐतिहासिक भूल पर बनी फिल्म शुद्र-द राइजिंग का स्पेशल प्रीमियर आयोजित किया गया.

shudra-filmशुद्र-द रायजिंग, फिल्म भारत में सदियों से चली आ रही जाति प्रथा पर आधारित है. ये फिल्म प्राचीन भारत के इतिहास और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर बुनी गई काल्पनिक कथा है. फिल्म पूर्वजों द्वारा की गई गलतियों के फलस्वरूप समाज पर हुए अत्याचार और अपनी गलतियों को सुधारने के लिए प्रेरित करता है. ताकि शुद्रों के साथ भेदभाव छोड़ मानवता धर्म को अपनाया जा सके. फिल्म संदेश देने की कोशिश करता है कि धर्म इंसानों के लिए बना है, इंसान धर्म के लिए नहीं बने हैं.

हालांकि शुद्र-द राइजिंग, फीचर फिल्म दलित मुद्दों को उठाने वाली कोई पहली फिल्म नहीं है, इससे पहले भी अछूत कन्या, आक्रोश, लगान, आरक्षण के अलावा कई अन्य फिल्मों में इस विषय को उठाया गया है. लेकिन एक घंटे पचास मिनट की ये फिल्म उन सभी फिल्मों से अलग दिखाई पड़ती है. शायद इसलिए की पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर दलित विषय को केंद्र में रखकर, उसके इतिहास में झांकने की कोशिश की गई है. फिल्म के जरिए किसी भी जाति को नीचा दिखाने, घृणा फैलाने की कोशिश नहीं की गई है, बल्कि जाति व्यवस्था से उत्पन्न उन सभी त्रासदियों को दिखाया गया है, जिसे समाज का एक वर्ग जाति के नाम पर हजारों साल से भुगत रहा है.

फिल्म के निर्देशक संजीव जायसवाल कहते हैं मेरी फिल्म पूरी तरह जातिप्रथा के खिलाफ है. मैंने इसकी तह में जाने की कोशिश की है. इसलिए अतीत में जाकर इसके कारण तलाशे हैं. इस फिल्म के जरिए मैं लोगों को यह बताउंगा कि हमारे अतीत में समाज में क्या और कैसे हुआ. कैसे हिंदुओं ने खुद को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में बांट रखा है. कैसे समाज में जहर फैला जिसने सदियों तक दलितों को अछूत बनाए रखा. फिल्मकार के अनुसार यह फिल्म उन करोड़ों शुद्रों की कहानी है जो सदियों से शोषण और दमन का शिकार कार हो रहे हैं. 

फिल्म के केंद्र में कुछ शुद्र युवक हैं जिन्हें जाति की वजह से उसे काफी दुख झेलना पड़ता है. बाद में वह बगावत का रास्ता अपनाता है, अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ मोर्चा खोला. यह कहानी उस संघर्ष की भी है जो शुद्र कहलाने वाले पिछले तबके के लोग भोजन, पानी, दवाई, आत्मसम्मान और आजादी के लिए मर रहे हैं. किसी शुद्र की मौत इसलिए ही हो जाती है कि उसने एक बूंद पानी पी लिया. घाव से पीडि़त आदमी दवा का मोहताज होकर मरता है, तो वहीं किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रताड़ना झेलनी पड़ती है कि उसके कानूनों में कुछ वेद-मंत्र चले गए हैं. इन सबकी वजह सिर्फ एक इनका शुद्र या अस्पृश्य जाती में जन्म लेना हैं. 

यह कम बजट की फिल्म है. फिल्म में इतनी बड़ी और गंभीर बात कहने के लिए निर्देशक ने नए कलाकारों का सहारा लिया हैं. निर्देशक संजीव जायसवाल के मुताबिक उन्हें विशाल छवि के सितारे नहीं चाहिए थे. उनका तर्क है यह बेहद संवेदनशील विषय है. मैं अपनी कहानी में समझौता नहीं करना चाहता था. अगर कोई बड़ा सितारा लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती.

संविधान निर्माता बी. आर. अंबेडकर को समर्पित ये फिल्म मनु स्मृति पर आधारित है. फिल्म टाइटल और बोल्ड विषय को लेकर चर्चा में है. निर्देशक संजीव जायसवाल के मुताबिक उन्हें सेंसर बोर्ड से फिल्म को सर्टिफिकेट लेने में छह महीने से ज्यादा का वक्त लगा. लेकिन उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि उनकी फिल्म बिना किसी काट-छांट के सेंसर बोर्ड से पास हुआ. 

अब वे शुद्र-द राइजिंग फीचर फिल्म को जल्द से जल्द देश में प्रदर्शित करने की योजना बना रहे हैं. लेकिन सिनेमा के माध्यम से खामोश क्रांति का सपना देखने वाले संजीव जायसवाल, खुद इसका शिकार होने से नहीं बच पाए. उनका कहना है कि ज्यादातर सिनेमा घरों के मालिक ने इस फिल्म को रिलीज करने से मना कर दिया है. उन्हें उम्मीद हैं कि वो जल्द ही बाकी बाधाओं को पार कर मानवता का संदेश लोगों तक पहुंचा सकेंगे. 

pankaj-kumar पंकज कुमार पत्रकार हैं.

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