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खेती पर संकट गहराया,औद्योगिक उत्पादन ढीला!
- Created on Saturday, 14 July 2012 11:54
- Written by एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
मानसून अभी बरसा नहीं झमाझम,किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें झलकने लगी हैं।मानसून बिगड़ा तो बेरोजगारी बढ़ेगी।औद्योगिक उत्पादन भी ढीला है।9 जुलाई यानि राष्ट्रपति चुनाव के बाद महंगाई की एक और मार झेलने के लिए तैयार रहिए।सरकार की नवउदारवादी नीतियों के चलते हमारी कृषि आज संकट के दौर से गुजर रही है।
एचएसबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक मानसून निराशाजनक रहा है और अगर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो मुद्रास्फीति के साथ-साथ सब्सिडी बिल भी बढ़ेगा। इससे रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत दरों में कटौती की गुंजाइश और सीमित हो जाएगी। सरकार ऐसे कानून बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं।
पिछले दो दशक में देशभर में अढ़ाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों को अपनी जमीन और खेती बचाना ही मुश्किल नहीं हो रहा है, बल्कि वह आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। कृषि भूमि का अधिग्रहण कर रियल-एस्टेट और उद्योगों के लिए किया जा रहा है। सरकार जिस भूमि का अधिग्रहण कर रही है उससे उजडे़ किसानों और ग्रामीणों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा।
कर्ज के बोझ से दबे किसानों की मुसीबत घटने के बजाए बढ़ती जा रही है। क्योंकि खाद के दाम फिर से बढ़ गये हैं।रुपये में गिरावट और डालर की मजबूती को आधार बनाकर डीएपी के दामों में प्रति बोरी 300 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।
उर्वरक का मूल्य नियंत्रण मुक्त होने से अप्रैल 2011 से जून 2012 के बीच दामों में करीब तीन गुना वृद्धि हुई है।गौरतलब है कि बीत नवंबर माह में डीएपी प्रति बोरी का मूल्य 765 रुपया था। उसे बढ़ाकर 910 से 1000 रुपया प्रति बोरी कर दिया गया है। सरकार द्वारा फास्फेटिक खादों को नियंत्रण मुक्त कर दिये जाने के बाद से अप्रैल 2011 से कंपनियों को दाम तय करने की आजादी हो गयी है।
तब से डीएपी व एनपीके जैसे फास्फेटिक उर्वरकों के दाम बढ़ने लगे है। पहली बार अप्रैल में डीएपी के दाम बढ़े थे। जब 480 से बढ़कर 765 रुपया कर दिया गया था।जानकारों का कहना है कि फास्फेटिक उर्वरक तैयार करने में जो कच्चा माल लगता है उनमें से 80 फीसदी विदेशों से आयात किया जाता है। बहरहाल डीएपी के दाम 13 माह में चौथी बार बढ़े है।
डीएपी की बोरी 1200 रुपये के पर मिलेगी।मानसून बुधवार को पूरे देश पर छा गया। लेकिन सामान्य से 23 प्रतिशत बारिश कम होने से चिंताएं बढ़ गई हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र में पीने के पानी की उपलब्धता तथा मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा और मक्का) का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
देश में कुल बारिश में जहां मॉनसून का 75 फीसदी योगदान है, वहीं सिंचाई के लिए कुल पानी की जरूरत का आधा इसी से हासिल होता है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि हम सब मॉनसून का पीछा करते हैं।
उन्होंने बताया कि यदि बारिश होती है, तो मौद्रिक नीति काम करती है। सब कुछ अच्छा रहता है। यदि बारिश नहीं होती है, तो चिंता की बात है। इसलिए मैं आपको यह महसूस कराना चाहता हूं कि हम सभी मॉनसून का पीछा करते हैं। मॉनसून इतना महत्वपूर्ण है कि यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी ने मॉनसून को देश का 'वास्तविक वित्त मंत्री' कहा था।
देश में सालाना लगभग 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है। इसका तीन चौथाई हिस्सा दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून से मिलता है। लेकिन दुखद यह है कि इसमें से भी सिर्फ 1,100 अरब घन मीटर का ही उपयोग हो पाता है बाकि पानी बह जाता है। किसी तरह यदि इस जल को रोक कर इसका उपयोग कर लिया जाए, तो मॉनसून पर देश की निर्भरता कुछ कम हो सकती है।
देश की औद्योगिक उत्पादन विकास दर पिछले साल मई के मुकाबले घट गई है, हालांकि मार्च और अप्रैल के मुकाबले आईआईपी के आंकड़े बेहतर जरूर हैं। उद्योग की हालत में सुधार नहीं आया है और आगे आईआईपी घटने की आशंका है। बड़ी चिंता की बात ये है कि पिछले साल के मुकाबले कैपिटल गुड्स, मैन्यूफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिसिटी ग्रोथ के आंकड़े बेहद निराश करने वाले हैं।
हालांकि कंज्यूमर ड्यूरेबल में तरक्की करीब दोगुनी हो गई है।लेकिन, मई के आईआईपी आंकड़ों को देखते हुए आरबीआई पर दरें घटाने का दबाव कम हो गया है।इन्फोसिस के खराब नतीजों और औद्योगिक उत्पादन की दर में आई गिरावट के चलते बाजार में गिरावट का माहौल देखने को मिला।यूरोपीय बाजारों के गिरावट पर खुलने से घरेलू बाजारों का हौसला पूरी तरह से टूट गया।
सेंसेक्स में 300 अंक से ज्यादा की गिरावट आई और निफ्टी 5200 के स्तर तक फिसल गया।मई में आईआईपी 2.4 फीसदी रही, जो अप्रैल 0.1 फीसदी के मुकाबले काफी ज्यादा थी। लेकिन, बेहतर आईआईपी आंकड़े भी बाजार में जोश नहीं भर पाए। सेंसेक्स में करीब 200 अंक रही और निफ्टी 5250 के स्तर पर बना रहा।इंफोसिस के उम्मीद से खराब नतीजों और कमजोर अंतर्राष्ट्रीय संकेतों ने बाजार पर दबाव बनाया।
आईआईपी आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहने के बावजूद बाजार करीब 1.5 फीसदी फिसले।सेंसेक्स 256 अंक गिरकर 17232 और निफ्टी 71 अंक गिरकर 5235 पर बंद हुए। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर 0.5 फीसदी से ज्यादा कमजोर हुए।एशियाई बाजारों में गिरावट और इंफोसिस के निराशाजनक नतीजों की वजह से घरेलू बाजार 1 फीसदी की गिरावट के साथ खुले।
इंफोसिस का गाइडेंस भी खराब होने से शुरुआती कारोबार में गिरावट गहराई और सेंसेक्स 200 अंक से ज्यादा टूटा।इसके बाद एशियाई बाजारों के संभलने से घरेलू बाजारों में कमजोरी थोड़ी कम हुई। हालांकि, आईआईपी आंकड़ों के पहले बाजार चिंतित नजर आए और बाजार में 1 फीसदी की गिरावट कायम रही।
यूरोजोन का संकट गहराने के बीच घरेलू शेयर बाजारों में आई गिरावट से मुद्रा बाजार में रुपया 31 पैसे गिरकर 55.94 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह रुपये का करीब दो हफ्ते का निचला स्तर है। मुद्रा बाजार के डीलरों के मुताबिक आयातकों द्वारा डॉलर की मांग से रुपये पर दबाव बढ़ा।
विदेशी बाजारों में डॉलर के मजबूत होने से भी रुपये का सेंटीमेंट कमजोर हुआ। बृहस्पतिवार को रुपया मजबूती के साथ 55.63 के स्तर पर खुला। सत्र में यह 55.95 के निचले स्तर तक रहा। आखिर में 31 पैसे की गिरावट लेकर 55.94 पर बंद हुआ। पिछले कारोबारी दिवस यह 55.63 के स्तर पर रहा था।
इसी बीच आरबीआई के गवर्नर डी सुब्बाराव ने कृषि क्षेत्र के डूबते कर्ज पर चिंता जताई है। पिछले 8 सालों में कृषि क्षेत्र में बैंकों के कर्ज गैर-कृषि क्षेत्र से ज्यादा डूबे हैं।डी सुब्बाराव के मुताबिक वित्त वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में एनपीए करीब 50 फीसदी बढ़े।
जबकि, गैर-कृषि क्षेत्र के एनपीए 40 फीसदी बढ़े।आरबीआई का कहना है कि कृषि कर्ज पर ब्याज दरों में छूट के असर की जांच की जाने चाहिए। सस्ता कृषि कर्ज का पैसा दूसरे इस्तेमाल में लाया जा रहा है।आरबीआई के मुताबिक कृषि कर्ज के इस्तेमाल पर नजर रखे जाने की जरूरत है। साथ ही, किसानों को सस्ता कर्ज देने की प्रणाली में बदलाव करने पर विचार करना चाहिए।
दूसरी ओर एचएसबीसी की एक रपट में कहा गया है कि अभी तक मानसून निराशाजनक रहा है और अगर पर्याप्त बारिश नहीं होती तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी साथ ही सब्सिडी बिल भी बढ़ेगा जिससे रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत दरों में कटौती की गुंजाइश और सीमित हो जाएगी।
एचएसबीसी के मुख्य अर्थशास्त्री (भारत व आसियान) लीफ लाइबेकर एस्केसन ने कहा, 'अगर संपूर्ण सीजन के दौरान बारिश सामान्य से काफी कम रहती है तो इसका असर आपूर्ति और कीमतों पर होगा, भले ही सरकार स्थिति से निपटने के लिए जो भी कदम उठाए।'रिजर्व बैंक की मौद्रिक एवं ऋण नीति की तिमाही समीक्षा से पहले एचएसबीसी के अर्थशास्त्री ने कहा 'रिजर्व बैंक इसलिये मौसम पर बारीकी से निगाह रखे हुये है।'
खराब मानसून के चलते पहले से ही सब्जियों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। दस दिन के दौरान आलू-प्याज से लेकर हरी सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। ये कीमतें पिछले साल इसी मौसम की तुलना में भी कहीं अधिक हैं।
अधिकतर सब्जियों के भाव बारिश भर कम नहीं होने जा रहे।बारिश में यूं भी हरी सब्जियां महंगी हो जाती हैं। लेकिन इस बार तेज गर्मी और बारिश का ऐसा असर हुआ कि सब्जियां एकदम से महंगी हो गईं। ऐसे में अब डीजल में 5 रुपये का इजाफा सब्जी खरीदने वालों और ज्यादा भारी पड़ने वाला है। सामान्य से कम बारिश होने का असर मोटे अनाजों मसलन ज्वार, बाजरा और मक्का के उत्पादन पर पडऩे की आशंका है। राष्ट्रपति चुनाव के बाद डीजल की कीमतों में बढोतरी तय मानी जा रही है।
पिछले एक साल से लगातार तेल कंपनियां डीजल कीमतों में बढोतरी की मांग कर रही हैं लेकिन राजनीतिक मजबूरी की वजह से इस मामले को सरकार अब तक टाल रही थी।सूत्रों की माने तो सरकार डीजल की कीमत बढ़ाने का कड़ा फैसला ले चुकी है और 19 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव के बाद इसकी कीमत में बढ़ोतरी का कभी भी ऐलान हो सकता है। माना जा रहा है कि ये बढ़ोतरी 2 से 4 रुपए प्रति लीटर तक हो सकती है।
तेल कंपनियों का तर्क है कि डीजल के हर लीटर में उन्हें 10 रुपये 33 पैसे का नुकसान हो रहा है और ऐसे में कीमत बढ़ाने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं हैं।तेल विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के मुताबिक सरकार लगभग मन बना चुकी है कि डीजल का आंशिक रूप से दाम बढ़ाए जाए।
3 से 4 रुपये प्रति लीटर। डीजल की कीमत में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा झटका आम लोगों को लगने वाला है, क्योंकि डीजल के दाम बढ़ने को सीधा असर माल भाड़े पर पड़ेगा और इसकी वजह से दूध, फल, अनाज, सब्जियां, सब कुछ के दाम बढ़ने तय हैं।
पहले से ही इन चीजों को दाम आसमान छू रहे हैं और अब डीजल की कीमत बढ़ने की खबर ने आम लोगों की चिंताएं और बढ़ा दी है।25 जून 2011 को आखिरी बार डीजल की कीमत में बढोतरी हुई थी और इसके बाद इस मुद्दे पर अधिकार प्राप्त मंत्रियों के ग्रुप की बैठक भी नहीं हुई है। पिछली बार इस ईजीओएम की अध्यक्षता प्रणब मुखर्जी ने की थी, लेकिन अब हालात थोड़े बदले हुए हैं। प्रणब राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं और उन्होंने वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।
माना जा रहा है कि टीएमसी पेट्रोल की तरह डीजल की कीमत बढ़ाने का भी खुल कर विरोध करेगी।डीजल की किमतों में बढोत्तरी निश्चित है लेकीन पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे आम आदमीपर और कितना बोझ डाला जाए यही सरकार के सामने सबसे बडा सवाल है।
ताजा खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश को 45000 करोड़ का पैकेज देगी। प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव पुलोक चटर्जी और उत्तर प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों के बीच हुई बैठक में इस पैकेज को मंजूरी दी गई।लेकिन राज्य सरकार इससे खुश नहीं है क्योंकि ये उसकी मांग का आधा भी नहीं है। दरअसल, अखिलेश यादव ने केंद्र से 93000 करोड़ रुपये के पैकेज की मांग की थी। इन पैसों का इस्तेमाल केंद्र की मदद से बनने वाले प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ कुछ अटके हुए प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में भी होगा।
कृषि और उससे संबंधित उद्योगों (जैसे-वनीकरण, मछली पालन) की जीडीपी में हिस्सेदारी 19 प्रतिशत है। यह देश की वर्कफोर्स में से 60 प्रतिशत को रोजगार देते हैं। निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 10.95 प्रतिशत है।कृषि क्षेत्र का औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है।
उद्योगों को कच्चा माल खेतों से ही मिलता है। कपड़ा उद्योग और चीनी मिल तो सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर हैं। कृषि उत्पादन के कम या ज्यादा होने का सीधा असर उद्योगों पर दिखता है। पिछले दो दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की कृषि पर निर्भरता कम हुई है। खनन, विनिर्माण, बिजली और निर्माण क्षेत्रों की भागीदारी 1970-71 में 21.6 प्रतिशत थी, जो 2004-05 में बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई। सेवा क्षेत्र 32 से 52.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
कृषि मंत्री शरद पवार, खाद्य मंत्री केवी थॉमस और मौसम विभाग के अधिकारियों ने मानसून की प्रगति पर चर्चा की। इसके बाद पवार ने कहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक को छोड़कर देश में पिछले दस दिन में हालात सुधरे हैं। दोनों राज्यों में बारिश संतोषजनक नहीं रही। मौसम विभाग के महानिदेशक एलएस राठौड़ ने कहा कि बारिश की स्थिति में सुधार है, लेकिन अब भी यह कम है।
अगले हफ्तों में भी बारिश सामान्य से कम रहने के आसार है। मानसूनी बारिश में सुधार से धान, सोयाबीन, कपास तथा मूंगफली की खेती में तेजी आएगी। उन्होंने कहा कि अब हिमालयी, तराई तथा पूर्वी क्षेत्र में बारिश का जोर बढ़ेगा। अब तक कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के कुछ भागों तथा मध्य प्रदेश के मध्य भागों में हल्की वर्षा हुई है।
मानसून की वर्षा न होने के कारण किसानों को डीजल इंजनों से चलने वाले ट्यूबवेलों का ही सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है। बिजली भी इन दिनों समय पर नहीं आ रही है और न ही लोगों को नहरी पानी समय पर उपलब्ध हो पा रहा है।
किसानों को मजबूरी में महंगा डीजल खरीदकर ही अपने खेतों की सिंचाई कर फसलों की रोपाई व बिजाई करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। चार-पांच रोज पूर्व क्षेत्र में मानसून ने तो दस्तक दे दी है। लेकिन सभी क्षेत्रों में अच्छी वर्षा न होने के कारण फसलों का कार्य पूरी तरह से प्रभावित हुआ है।
शरद पवार ने संवाददाताओं को बताया कि देशभर में खरीफ फसलों की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि धान, कपास, गन्ना और सोयाबीन की फसलों को लेकर कोई चिंता नहीं है। हाल ही में हुई बारिश से धान की रोपाई में भी तेजी आएगी।
मध्य प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अच्छी बारिश हुई है, इसलिए धान उत्पादक क्षेत्रों में अभी तक कोई समस्या नहीं है। कृषि मंत्री ने कहा कि गुजरात और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में पिछले दो दिनों में अच्छी बारिश हुई है इससे मूंगफली और सोयाबीन की बुवाई में तेजी आएगी।उन्होंने बताया कि समस्या केवल मोटे अनाजों की है जिनकी बुवाई की स्थिति अभी तक अच्छी नहीं है।
उन्होंने कहा कि बारिश की कमी से खाद्यान्न की कीमतों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि केंद्रीय पूल में खाद्यान्न का रिकॉर्ड स्टॉक जमा है।
मई में आईआईपी ग्रोथ बढ़कर 2.4 फीसदी रही है, जबकि मार्च में आईआईपी केवल 0.1 फीसदी रही थी। हालांकि अप्रैल की संशधित आईआईपी 0.1 फीसदी से बढ़कर 0.9 फीसदी हो गई है।
वहीं साल दर साल आईआईपी पर नजर डाली जाए को यह 6.2 फीसदी से घटकर 2.4 फीसदी हो गई है।मई में कैपिटल गुड्स ग्रोथ घटकर -7.7 फीसदी हो गई है। पिछले साल मई में कैपिटल गुड्स ग्रोथ 6.2 फीसदी रही थी। मई में कंज्यूमर ड्यूरेबल ग्रोथ 9.3 फीसदी हो गई है, जबकि पिछले साल इसी महीने कंज्यूमर ड्यूरेबल ग्रोथ 5.1 फीसदी रही थी। वहीं इस महीने कंज्यूमर गुड्स ग्रोथ 7.2 फीसदी से घटकर 4.3 फीसदी हो गई है।
इस महीने कंज्यूमर नॉन-ड्यूबल गुड्स ग्रोथ घटकर 0.1 पर आ गई है, जबकि मई 2011 में कंज्यूमर नॉन-ड्यूबल गुड्स ग्रोथ 9 फीसदी की रही थी। साथ ही बेसिक गुड्स की ग्रोथ पिछले साल की तुलना में घटकर 4.1 फीसदी हो गई है, पिछले साल मई में यह 7.5 फीसदी रही थी। हालांकि इंटरमीडियेट गुड्स ग्रोथ इस महीने बढ़ोतरी देखने को मिली है और ये बढ़कर 2.7 फीसदी हो गई है, जबकि पिछले साल मई में इंटरमीडियेट गुड्स ग्रोथ 0.1 फीसदी पर थी।मई में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ग्रोथ घटकर 2.5 फीसदी हो गई है। वहीं मई 2011 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 6.3 फीसदी रही थी। साल दर साल की तुलना में मई में माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ 1.8 फीसदी से घटकर -0.9 फीसदी पर गई है।
बिजनेस स्टैंडर्ड का यह संपादकीय गौरतलब हैः
मई माह के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के त्वरित अनुमान गुरुवार को जारी किये गए। कई महीनों की स्थिरता अथवा गिरावट के बाद इनमें 2.4 फीसदी की मामूली लेकिन सकारात्मक वृद्घि दर्ज की गई। इन आंकड़ों से बहुत अधिक उम्मीद पालना सही नहीं होगा।
ये न केवल बहुत कम हैं बल्कि इनमें बहुत अधिक अस्थिरता भी है। दरअसल सरकारी सांख्यिकीविदों को पिछले महीने के आईआईपी वृद्घि के आंकड़ों को संशोधित करना पड़ा और अप्रैल माह में इनमें 0.9 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। जबकि पहले दावा किया गया था कि इनमें 0.1 फीसदी का सुधार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के लिए कठिनाई का दौर रहा है और यह अंतर आईआईपी से जुड़े संशय को कतई दूर नहीं करेगा। फिर भी इन आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश के संकटग्रस्त औद्योगिक क्षेत्र में मामूली लेकिन महत्त्वपूर्ण सुधार देखने को मिलता है।
खनन क्षेत्र अभी भी गंभीर संकट में है और मई महीने में इसमें 0.9 फीसदी की गिरावट आई। स्वीकृति मिलने में होने वाली देर और न्यायिक नियंत्रण इस क्षेत्र के कष्ट की वजह बना रहा। इसके अलावा पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 7.7 फीसदी की गिरावट से यही संकेत मिलता है कि निवेश और पूंजी निर्माण की स्थिति में अभी तक कोई खास सुधार नहीं हुआ है। जाहिर सी बात है कि निकट भविष्य में देश की विकास पथ पर वापसी आसान नहीं है।
बहरहाल, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन की बदौलत उपभोक्ता वस्तुओं के सूचकांक में 4.3 फीसदी का इजाफा हुआ। विनिर्माण क्षेत्र में 2.5 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई। इन आंकड़ों से थोड़ी सजगता के साथ ही सही लेकिन आशावाद तो पैदा होता ही है। सरकार ने भी अब हकीकत को समझने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं बल्कि आर्थिक मसलों पर उसने कुछ तत्परता भी दिखाई है तो ऐसे में उसे इन संकेतों को सुधार के संकेत के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
उसे भी प्रोत्साहन उपायों में तेजी लानी चाहिए। अल्पावधि के दौरान प्रशासनिक कदमों, सहज स्वीकृतियों और बुनियादी ढांचा निवेश के जरिये सार्वजनिक बचत की प्राथमिकताएं तय करके वह औद्योगिक विकास को पटरी पर ला सकती है।
वह सुधार की वापसी के लिए उपभोक्ताओं की मांग बढऩे का इंतजार नहीं कर सकती। मुद्रास्फीति संबंधी ताजा आंकड़े अभी नहीं आए हैं लेकिन आशंका है कि वे इस वर्ष के उच्चतम स्तर पर रहेंगे। अस्थिर मॉनसूनी बारिश के चलते खाद्यान्न कीमतें पहले ही बढ़ रही हैं। मांग में भी कमी आएगी। ऐसे में अल्पावधि के दौरान निवेश को बढ़ावा देने संबंधी उपायों के जरिये कारोबारी उत्साह जगाने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
बहरहाल, भारत शायद विनिर्माण के कारोबारी चक्र में अपने सबसे बुरे दौर से उबरता नजर आ रहा है, तो ऐसे में इस संपूर्ण चक्र के असर पर नजर डालना महत्त्वपूर्ण है। सीधी सी बात है, एक तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था जिसके पास प्रचुर मानव संसाधन मौजूद हो, वह ऐसे विनिर्माण चक्र को नहीं झेल सकती है जहां निचला स्तर नकारात्मक हो और ऊपरी स्तर बमुश्किल दोहरे अंकों में हो।
इस समूची मंदी का सबसे बड़ा सबक यह है कि भारत का कमजोर विनिर्माण क्षेत्र विकास गाथा के मूल में बना रहेगा। राष्ट्रीय विनिर्माण नीति में ऐसे समुच्चय बनाने का लक्ष्य तय किया गया है जहां औद्योगिक विकास गति पकड़ सके लेकिन उसमें लगातार देरी हो रही है। यह देरी आंशिक तौर पर श्रम और पर्यावरण कानूनों पर इसके असर को लेकर हो रही है। औद्योगिक क्षेत्र में व्याप्त निराशा से सरकार को यह समझना चाहिए कि इसमें और देरी नहीं की जा सकती।



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