लड़ो कहलगांव, पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती!

पुलिस की बेरहम पिटाई के शिकार रणधीर यादव

सात साल का राजीव यादव

घायल मनोज यादव

घायल मनोरमा देवी, गर्भवती चंपा देवी और अन्य महिलाएं
फारबिसगंज में पुलिस गोलीकांड का कुख्यात वीडियो फुटेज
♦ डॉ मुकेश कुमार
बिहार के भागलपुर जिले के कहलगांव में सुशासन की सरकार की बर्बर पुलिस 1020 एकड़ जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों पर कहर बनकर टूट पड़ी। यह घटना 30 जून 2012 की रात तब घटी, जब ग्रामीण चैन की नींद सो रहे थे। भारी संख्या में पुलिस का जत्था अचानक धमक गया और स्त्रियों-बच्चों-वृद्धों-पुरुषों, यहां तक कि जानवरों पर भी डंडे बरसाने लगी। ग्रामीण जब तक कुछ समझ पाते, तब तक पुलिस नागरिक सह किसान-मजदूर संघर्ष समिति के सचिव रणधीर यादव समेत तीन-चार लोगों को उठा ले गयी। पुलिस रणधीर यादव को घसीटते और डंडे बरसाते हुए ले गयी। इस पूरे घटनाक्रम में तीन-चार बच्चे भी जख्मी हुए, आधा दर्जन महिलाएं घायल हुईं और रणधीर यादव को तमाम नियम-कानूनों को ताख पर रखते हुए पहले एनटीपीसी और फिर भागलपुर शहर से एकदम सटे सबौर थाना लाकर बर्बरतापूर्वक पीटा गया। इस पिटाई से रणधीर यादव के शरीर-पीठ, चूतड़ (हिप) और तलवे पर गहरे लाल-काले निशान बन गये। इसकी तस्वीर मीडिया में भी आयी।
अभी कुछ दिनों पूर्व जब लगभग दो दर्जन जनसंहारों के आरोपी रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या से गुस्साये सेना समर्थकों ने राजधानी समेत पूर राज्य में भयानक उत्पात मचाया था, तो सुशासन की पुलिस मूक दर्शक बनी तमाशा देखती रही थी। वहीं एक साल पूर्व फारबिसगंज में जब गरीब-अल्पसंख्यक प्राइवेट कंपनी द्वारा रास्ता बंद किये जाने का विरोध कर रहे थे, तो आधा दर्जन लोगों को जान गंवानी पड़ी थी।
रणधीर यादव को फिलहाल जेल भेज दिया गया है। यह ताजा घटना कहलगांव के बभनगामा-रामजानीपुर गांव की है, जहां पुलिस ने रात में यह कारनामा कर दिखाया। रणधीर यादव की पत्नी मनोरमा देवी को भी सर पर चोट आयी है। गर्भवती महिला चंपा देवी को भी मारा गया है। चालीस वर्षीय मनोज यादव, जो कोलकाता में मजदूरी करता है, पुलिस उसे भी उठा ले गयी और उसका हाथ तोड़ दिया और तलवे पर लाठियां बरसायीं। बत्तीस वर्षीय टुनटुन यादव को भी थाने ले जाकर पीटा गया। सात साल के बच्चे राजीव कुमार का राइफल के कुंडे से मारकर हाथ तोड़ डाला। पुलिस ने एक भैंस को इतनी बर्बरता से पीटा कि उसकी चमड़ी उघड़ गयी।
सुशासन की सरकार में मानवाधिकार का यह खुला उल्लंघन न्याय के साथ बिहार के विकास, महिला सशक्तीकरण और सुशासन के तमाम दावों की पोल खोलता है ।
क्या जुर्म है इनका
दरअसल यह पूरी घटना बियाडा भूमि अधिग्रहण से संबंधित है। राज्य सरकार कहलगांव प्रखंड के ग्यारह गांव क्रमशः रामजानीपुर, बभनगामा, अलीपुर, कुतुबपुर, बिसनपुर, लोगांय, हबीबपुर, हरिचक, कासडी, जानमोहनपुर और कहलगांव के सात मौजे क्रमशः बभनगामा, रामजानीपुर, अलीपुर, कुतुबपुर, बिसनपुर, हबीबपुर और लोगांय की लगभग 1020 एकड़ बहुफसली जमीन अधिग्रहित कर निजी कंपनियों के हवाले कर रही है। इस अधिग्रहण से वर्तमान में लगभग 6000 परिवार बेजमीन व बेरोजगार हो जाएंगे। इस अधिग्रहण की शुरुआत लालू-राबडी राज में 1996-97 में हुई थी।
इस समय प्रथम चरण के अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी कर 60 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजे की दर से जमीन अधिग्रहण की बात सामने आयी थी। इसका भुगतान वर्ष 2001 में 90 हजार प्रति एकड़ की दर से किया गया। दूसरे चरण के अधिग्रहण की शुरुआत 1998-99 में हुई और एक लाख बीस हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से वर्ष 2002 में भुगतान किया गया। जबकि तीसरे चरण के अधिग्रहण की शुरुआत 2004 के आस-पास हुई और 2007 में कुछ मौजे का दो लाख अस्सी हजार तो किसी में चार लाख बीस हजार की दर से भुगतान हुआ।
किसान प्रारंभ से ही इस बहुफसली उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ थे। लेकिन सरकारी अधिकारियों (भू-अर्जन पदाधिकारी) के द्वारा उस वक्त किसानों को भय दिखाया गया कि यदि किसान मुआवजा ग्रहण नहीं करेंगे तो यह राशि ट्रेजरी में जमा हो जाएगी और किसानों को यह भी नहीं मिल पाएगा। इसी भय से किसानों ने मुआवजा लेना शुरू किया, लेकिन इस आपत्ति के साथ कि इस मुआवजे से उन्हें संतोष नहीं है। बावजूद इसके 40 फीसदी किसानों ने अब भी मुआवजा ग्रहण नहीं किया है। बताते चलें कि सात मौजे की इस जमीन पर ज्यादातर छोटे-मंझोले करीब 600 किसानों का मालिकाना है, जो अब बढकर 6000 परिवार तक पहुंच गया है, जिससे लगभग बीस हजार लोगों की आजीविका सीधे जुड़ी है और खेत-मजदूरों को शामिल कर दें, तो लगभग 45 से 50 हजार लोगों की। इस जमीन के मालिकाने में लगभग क्रमशः 300 यादव, 100 मुड़ीयारी (अत्यंत पिछड़ी जाति), 70 कुर्मी, 30 कुम्हार, 25 बढ़ई, 28 तांती, 20 राजपूत और 10 ब्राहमण जाति की जमीन जा रही है। इस जमीन के चले जाने के बाद 90 फीसदी परिवारों के पास वासगीत जमीन के अलावे कोई जमीन नहीं बचेगी, जबकि ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी की प्राप्त आजीविका से वंचित हो जाएंगे। इसलिए किसानों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है।
बहुफसली है यह 1020 एकड़ जमीन
इस जमीन पर किसान मिर्च, आलू, प्याज, टमाटर, करेला, भिंडी और अन्य शाक-सब्जी के अलावा मक्का, गेहूं व अरहर की खेती करते हैं। इस कुल जमीन के लगभग तीस फीसदी जमीन पर आम का खूबसूरत बगीचा है। यहां का उत्पादित दूधिया मालदह आम बहुत मशहूर है, जो कोलकाता सहित देश के अन्य स्थानों को जाता है और यहां के लोगों को इससे काफी आमदनी होती है। इस जमीन पर हजारों ताड़ के पेड़ हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस जमीन से लगभग दस करोड़ रुपये की आमदनी होती है। इस अधिग्रहण से प्रति वर्ष प्राप्त होने वाले रोजगार और आमदनी से तो वे मरहूम होंगे ही साथ ही पीढ़ी -दर-पीढ़ी पलायन के लिए विवश होंगे।
दोषपूर्ण है सरकार की मुआवजा नीति
किसान शुरू से ही इस बहुफसली जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ हैं। किसानों का कहना है कि ऐसी जमीन का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए। यदि सरकार के लिए यह इतना ही जरूरी है तो हमें दीर्घ-स्थायी मुआवजा मिलना चाहिए। किसानों की मांग है कि उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित रेवेन्यू दर से मुआवजा दिया जाए तथा उनके आश्रितों को वंशानुक्रम सरकारी नौकरी की गारंटी मिले। राज्य सरकार की रेवेन्यू दर के मुताबिक इस क्षेत्र के लिए कॉमर्शियल जमीन का लगभग 38 लाख प्रति एकड़ तथा कृषि योग्य जमीन का लगभग 19 लाख प्रति एकड़ निर्धारित है। किसानों का आरोप है कि सरकार अपने नियम की खुद अनदेखी कर रही है। किसान यह भी कह रहे हैं कि इस अधिग्रहण में जिनकी जमीन जा रही है, न तो उनकी नौकरी की ही गारंटी है और न ही लगने वाली कंपनियों की कोई स्थानीय सामाजिक जिम्मेदारी ही तय की गयी है।
सरकार किसे सौंपेगी यह जमीन
हजारों परिवार को जमीन और आजीविका से बेदखल कर सरकार इसे विभिन्न निजी कंपनियों को सौंपेगी। यहां सीमेंट की फैक्ट्रियां लगेंगी और मेगा फूड पार्क, फूड रिसर्च सेंटर व हैंडलूम पार्क आदि खुलेंगे। अधिग्रहित की जा रही जमीन से एक किमी से भी कम दूरी पर गंगा नदी बहती है और मात्र पांच किमी पर एनटीपीसी का बिजली उत्पादन केंद्र है। यही कारण है कि कंपनियां इस दोहरे लाभ को छोड़ने के मूड में नहीं दिखती है और हर प्रकार का तिकड़म कर रही है। कंपनियों द्वारा दलालों-गुंडों की भी मदद ली जा रही है ताकि ग्रामीणों की एकता को खंडित किया जा सके। राज्य सरकार और उसकी पूरी मशीनरी तो उनके साथ है ही। प्रशासन के रोज सख्त होते बयान इसी सच्चाई को उजागर कर रहे हैं। आखिर जनता के मतों से चुनी हुई सरकार भला जनता पर यूं ही लाठियां नहीं बरसातीं। बिहार के फारबिसगंज से लेकर पश्चिम बंगाल के सिंगूर-नंदीग्राम, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, यूपी आदि में यही तो हुआ और हो रहा है। पूरे देश में जल-जंगल-जमीन विरोधी आंदोलनों के साथ एक जैसा बर्ताव किये जा रहे हैं।
इस घटना के राजनीतिक रंग
मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना को भाजपा-जदयू जायज ठहराने में लगी है और उसके स्थानीय नेता कंपनियों की दलाली कर रहे हैं। भाजपा के पीरपैंती विधायक अमन पासवान ने तो इस बर्बर पुलिसिया कार्रवाई के तुरंत बाद कहा कि पुलिस अपना काम कर रही है! यहां उनसे यह सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि कानून की आखिर किस धारा के अंतर्गत पुलिस को यह अधिकार प्राप्त है कि वह ग्रामीणों के साथ ऐसा बर्ताव करे? और एक सवाल यह भी कि क्या यही सुशासन है? इस घटनाक्रम पर कांग्रेस-लोजपा-सीपीएम का संकोच बना हुआ है। कभी इस इलाके में सीपीएम की साख हुआ करती थी, जो अब बची नहीं है। हालांकि सीपीआई के पूर्व विधायक और एक पूर्व एमएलसी घटनास्थल का दौरा कर घटना की निंदा जरूर कर आये हैं, लेकिन ये भी अब तक इससे ज्यादा आगे नहीं जा पाये हैं! हां राजद पहले दिन से ही थोड़ा आगे-पीछे वाले अंदाज में मैदान में बना हुआ है। हालांकि इस अधिग्रहण की प्रक्रिया ही जब उन्हीं के राज-काज में शुरू हुई थी, तो उसके संकट को समझा जा सकता है! अपने जनाधार को बचाने का संकट अगर नहीं होता तो राजद शायद मैदान में होती भी नहीं। स्थानीय मीडिया में अभी से ही यह चर्चा बनी हुई है कि राजद एक कदम आगे और दो कदम पीछे जाकर प्रशासन का ही काम आसान कर रही है। इस दौरान घटना से आक्रोशित ग्रामीणों ने जब एक जुलाई से लगभग बयालीस घंटे तक एनएच अस्सी जाम कर रखा था, तो राजद के ही एक पूर्व विधायक और भागलपुर जिलाध्यक्ष ने बिना किसी शर्त के जाम हटवा दिया था, जिससे अखबारों में भी काफी किरकिरी हुई थी। साथ ही पूर्व घोषित कार्यक्रम प्रदर्शन और नुक्कड़ सभा भी स्थगित कर देने से इसे बल मिला।
इन सबसे अलग भाकपा-माले ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मोर्चा खोल दिया है। घटना के तुरत बाद माले की जांच दल ने इसकी छानबीन की और पहले बयान जारी किया फिर दूसरे ही दिन नीतीश कुमार का पुतला फूंका। माले की टीम ने आस-पास के गावों में लगातार कंपेन चला रखा है और इस घटना की आग बुझने न पाये, इसकी पूरी कोशिश कर रही है। इस बीच नौ जुलाई को भागलपुर स्थित स्टेशन चौक पर माले की ओर से एक दिवसीय महाधरना भी दिया गया, जिसमें एक सौ से ज्यादा ग्रामीणों ने हिस्सा लिया था। माले की ओर से रणधीर यादव की बिना शर्त रिहाई, घटना की उच्चस्तरीय जांच, सभी फर्जी मुकदमों की अविलंब वापसी सहित जमीन अधिग्रहण पर तत्काल रोक की मांग की गयी है। माले ने स्टेंड लिया है कि एक तो इस बहुफसली जमीन का अधिग्रहण न हो और यदि हो तो किसानों की सभी मांगें मानी जाए। इधर नवगठित सोसलिस्ट पार्टी (इंडिया) भी सक्रिय हुई है।
प्रशासन का गर्म रुख
फिलहाल प्रशासन का रुख काफी गर्म है। प्रशासन किसानों को देख लेने वाली मुद्रा में है। किसानों को धमकी भरे शब्दों में रोज-ब-रोज चेतावनी दी जा रही है। उक्त जमीन पर धारा 144 लगाकर किसानों के उसमें घुसने पर पाबंदी लगा दी गयी है। बाहर से भी आने वालों को धमकी वाले अंदाज में चेतावनी दी गयी है। पूर्व में किसानों पर जो एक दर्जन झूठे मुकदमे लादे गये थे, अब उन्हें आत्मसमर्पण करने नहीं तो उनके घरों की कुर्की-जब्ती की बात कही जा रही है। क्षेत्र में दलालों और मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया गया है। इस पूरे घटनाक्रम से आंदोलनकारियों की नींद हराम हो गयी है। आंदोलन के किसान नेता ओम प्रकाश यादव सहित अन्य पर भी काफी दबाव बनाया जा रहा है। साथ ही बिचोलिये-दलालों द्वारा आंदोलन के खिलाफ झूठा प्रचार भी किया जा रहा है।
न्यायालय की शरण में भी गये हैं किसान
काफी देर से ही सही, किसान वर्ष 2011 में इस मामले को लेकर कोर्ट भी गये हैं। फिलहाल मामला हाई कोर्ट में लंबित है। आपत्ति के साथ मुआवजा ग्रहण करने के मामले को लेकर किसान भागलपुर कोर्ट भी गये हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि हाईकोर्ट ने माना है कि एनेक्सर 17 के तहत इस जमीन का अधिग्रहण उचित नहीं है। इस जमीन को एनेक्सर 5 के तहत अधिग्रहित करते हुए इसके प्रावधानों के मुताबिक मुआवजा दिया जाना चाहिए। क्योंकि एनेक्सर 17 के तहत खनिज संपदा वाली जमीन ही अधिग्रहित की जाती है।
क्या भविष्य होगा किसानों का
उक्त 1020 एकड़ जमीन अधिग्रहित हो जाने से लगभग चालीस हजार लोगों की आजीविका छिन जाएगी। वे पलायन को विवश होंगे और राज्य सरकार के पलायन रोकने के दावे की एक बार फिर हवा निकल जाएगी! फैक्ट्री लगने से उसमें स्किल्ड लेबर की ही जरूरत होगी और ग्रामीणों को यहां भी निराशा ही हाथ लगेगी। हालांकि किसान पास के एनटीपीसी के नौकरी देने के वायदे की सच्चाई देख चुके हैं कि किस प्रकार नौकरी का झांसा देकर उपजाऊ जमीन अधिग्रहित कर ज्यादातर लोगों को ठेंगा दिखा दिया गया था।
(डॉ मुकेश कुमार। हिंदी मासिक पत्रिका पीपुल वायस के संपादक। उनसे उर्दू बाजार रोड, रामसर चौक, भागलपुर 812002, बिहार पर संपर्क किया जा सकता है। उनका मोबाइल नंबर 09431690824 है और ईमेल आईडी है drmukeshkumar.bgp@gmail.com)
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