BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Tuesday, February 2, 2016

किलों पर जितनी चाहे उतनी निजी सेना तैनात कर लें हुक्मरान। बाजू भी बहुत हैं तो सर भी बहुत हैं! हिंसा और नरसंहार के खिलाफ जाग रहा है भारत का जनमानस अग्निपाखी! मुंबई में सिंह गर्जना से जाहिर है कि दिल्ली और नागपुर के लठैतों की चलेगी नहीं।और तो और,संघ के मुख्यालय नागपुर की दीक्षाभूमि से एक बहुत बड़ा मोर्चा संघ मुख्यालय तक गया और वहां ऐसा निरंतर होने वाला है। बुद्धं शरणमं गच्छामि कोई हिंदुत्व की तरह राजनीतिक धर्म नहीं है।यह भारत के इतिहास की गूंज है।यह गूंज देशभर में तेज होने जा रही हैं । हिंसा ,घृणा और नरसंहार उत्सव के खिलाफ नागपुर और कोलकाता में ही नहीं, देशभर में अमन चैन के लिए शांति मार्च निकलने को है। रोहित वेमला अब कोई चेहरा नहीं है। रोहित वेमुला अब कोई अस्मिता भी नहीं है।न जात न मजहब। यह चेहराफासिज्म के राजकाज के खिलाफ जनता के हक हकूक की लड़ाई का बवंडर है जो सत्तर साल से ठहरा हुआ था,अब शुरु हुआ है।

किलों पर जितनी चाहे उतनी निजी सेना तैनात कर लें हुक्मरान।

बाजू भी बहुत हैं तो सर भी बहुत हैं!

हिंसा और नरसंहार के खिलाफ जाग रहा है भारत का जनमानस अग्निपाखी!


मुंबई में सिंह गर्जना से जाहिर है कि दिल्ली और नागपुर के लठैतों की चलेगी नहीं।और तो और,संघ के मुख्यालय नागपुर की दीक्षाभूमि से एक बहुत बड़ा मोर्चा संघ मुख्यालय तक गया और वहां ऐसा निरंतर होने वाला है।

बुद्धं शरणमं गच्छामि कोई हिंदुत्व की तरह राजनीतिक धर्म नहीं है।यह भारत के इतिहास की गूंज है।यह गूंज देशभर में तेज होने जा रही हैं ।


हिंसा ,घृणा और नरसंहार उत्सव के खिलाफ नागपुर और कोलकाता में ही नहीं, देशभर में अमन चैन के लिए शांति मार्च निकलने को है।


रोहित वेमला अब कोई चेहरा नहीं है।

रोहित वेमुला अब कोई अस्मिता भी नहीं है।न जात न मजहब।


यह चेहराफासिज्म के राजकाज के खिलाफ जनता के हक हकूक की लड़ाई का बवंडर है जो सत्तर साल से ठहरा हुआ था,अब शुरु हुआ है।

SFI activists raise slogans at the Rohith Vemula protest in Delhi

https://www.youtube.com/watch?v=43IymOEZcmI


पलाश विश्वास

पहा पहा मंजूळा हा माझा भिमरायाचा मळा ....

रोहित वेमूला के समर्थन मे आदरनीय बाळासाहेब आंबेडकर के नेत्रुत्व मे कल मूंबई मे निकाले मोर्चे का विहंगम नजारा ....



बंगाल के जंगल महल में भी समता और शांति के लिए जुलूस निकल रहा है।भारत के हर शहर,गांव और कस्बे से अब जुलूस निकलेंगे फासिज्म के खिलाफ।


बाजू भी बहुत है तो सर भी बहुत है -हिंसा और नरसंहार के खिलाफ जाग रहा है भारत का जनमनस अग्निपाखी।


मुंबई में सिंह गर्जना से जाहिर है कि दिल्ली और नागपुर के लठैतों की चलेगी नहीं।


और तो और,संघ के मुख्यालय नागपुर की दीक्षाभूमि से एक बहुत बड़ा मोर्चा संघ मुख्यालय तक गया और वहां ऐसा निरंतर होने वाला है।अपने अपने किलों पर जितनी चाहे उतनीनिजी सेना तैनात कर लें हुक्मरान।पूरे देश खा सलवा जुड़ुम बना दें।

बाजू भी बहुत हैं तो सर भी बहुत हैं!

हिंसा और नरसंहार के खिलाफ जाग रहा है भारत का जनमानस अग्निपाखी!



बुद्धं शरणमं गच्छामि कोई हिंदुत्व की तरह राजनीतिक धर्म नहीं है।यह भारत के इतिहास की गूंज है।यह गूंज अब देशभर में तेज होने जा रही हैं ।


हिंसा ,घृणा और नरसंहार उत्सव के खिलाफ नागपुर और कोलकाता में ही नहीं देशभर में अमन चैन के लिए शांति मार्च होने वाला है।


रोहित वेमला अब कोई चेहरा नहीं है।

रोहित वेमुला अब कोई अस्मिता भी नहीं है।


यह फासिज्मके राजकाज के खिलाफ जनता के हक हकूक की लड़ाई का बवंडर है जो सत्तर साल से ठहरा हुआ था,अब शुरु हुआ है।


मीडिया का करिश्मा देख लें तनिक तो मजा ही मजा।दिल्ली में फासिज्म की निजी सेना ने हमारे बच्चों पर जो कहर ढाया और देशभर में उसकी जो तीखी प्रतिक्रिया है,उसके जबाव में जवाबी वीडियो वाइरल दिखाया गया कि छात्राएं उकसा रही थीं।यह दलील अमूमन बलात्कार को जायज टहराने की दलील होती है।


पद्मभूषण अनुपम खेर का बहुत बहुत धन्यवाद कि देर शाम तक साफ कर दिया कि पाकिस्तान के साहित्योत्सव में जिन अठारह लोगों को न्यौता भेजा गया है,उनमें वे एकमात्र हैं,जिनने पाकिस्तानी वीसा के लिए आवेदन ही नहीं किया।


वरना इस मुद्दे पर दूसरा कारगिल किये बिना मीडिया वाले मानते नहीं।आज का दिन अनुपम खेर और सुप्रीम कोर्ट के लाइव प्रसारण के नाम रहा और कल की फासिस्ट बर्बरता की सुर्खियां बासी हो गयी।


मुश्किल यह है कि रोहित के दलित या ओबीसी परिचय के रिसर्च पर जरुरत से जियादा ध्यान देने और मंडल कमंडल आग भड़काने से भी रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ न्याय और समता की लड़ाई देश के कोने कोने में रोज तेज होती जा रही है।


संघ के मुख्यालय नागपुर की दीक्षाभूमि से एक बहुत बड़ा मोर्चा संघ मुख्यालय तक गया और वहां ऐसा निरंतर होने वाला है।


बुद्धं शरणमं गच्छामि कोई हिंदुत्व की तरह राजनीतिक धर्म नहीं है।यह भारत के इतिहास की गूंज है।यह गूंज अब देशभर में तेज होने जा रही हैं ।


हिंसा ,घृणा और नरसंहार उत्सव के खिलाफ नागपुर और कोलकाता में ही नहीं देशभर में अमन चैन के लिए शांति मार्च होने वाला है।


रोहित वेमला अब कोई चेहरा नहीं है।

रोहित वेमुला अब कोई अस्मिता भी नहीं है।


यह फासिज्मके राजकाज के खिलाफ जनता के हक हकूक की लड़ाई का बवंडर है जो सत्तर साल से ठहरा हुआ था,अब शुरु हुआ है।


दूल्हों और दुल्हनों,बारातियों के शिकंजे से बाहर निकली बहुजन जनता देश के कोने कोने में जाति दर्म के नाम आपस में लड़ते रहने की विरासत छोड़कर गोलबंद हो रहे हैं।


बाजू भी बहुत हैं और सर भी बहुत हैं।


यह हिंदुस्तान की सर जमीं मध्य बिहार का कोई इकलौता गांव नहीं है,जहां निजी सेनाएं नरसंहार करती रहेगी और जुल्म केखिलाफ हर आवाज कुचल दी जायेगी।


हिंदुस्तान इतना बड़ा मुल्क है कि कोई तानाशाह इसे कभी जीत नहीं पाया,इतिहास बदलने वाले लोग देख लें।


जागरण और नवजागरण की बात करने वाले लोग जान लें कि तुर्की से जो बाबर आये थे भारत जीतने,उसी तुर्की ने चौदहवीं सदी में बाबर के भारत विजय से पहले तक समूचे यूरोप को गुलाम बनाये रखा था।लगातार लगातार किसानों के आंदोलन ने न सिर्फ यूरोप की दुनिया की तस्वीर बदल दी है।


हम तो गुलामों की गुलामी को अपनी आजादी मानते रहे हैं जबकि दिल्ली की सत्ता का रंग चाहे जो हो,बाकी भारत न कभी गुलाम रहा है और न आज गुलाम है।आरत के आदिवासी और किसान कभी गुलमा थे ही नहीं और न आज हैं।


मीडिया के मुताबिक उनका आंदोलन थमने वाला नहीं है,जिनके पुरखे बंदूकों तोपों से मुकाबला करते रहे हैं।


इतिहास लिखने वाले यह सबक इतिहास का सबसे पहले सीख लें।


उसी गुलाम वंश के वारिशान आज का सत्तावर्ग है।


कुलीन नवजागरण की वजह से फ्रांसीसी क्रांति नहीं हुई,वह क्राति हुई समूचे यूरोप में दैवी सत्ता और चर्च के खिलाफ किसान आंदोलनों के बवंडर उठने के बाद।


दैवी सत्ता भारत की विरासत कभी नहीं रही तो दैवी सत्ता की जमीन विदेशी है।


हमारे पुरखों ने कभी गुलामी मंजूर नहीं की और भक्ति आंदोलन भी दैवी सत्ता और सामंत प्रभुओं के खिलाप महाविद्रोह रहा,जो आदिवासी किसान विद्रोहों की  निरतरता में हमारे इतिहास की लोक विरासत है।


इसे सब अल्टर्न कारपोरेट साहित्योत्सव वाले विद्वतजन न समझेंगे और न धर्माध।


भरतीय जनमानस भी अग्निपाखी है जो बार बार राख से जिंदा निकलता है क्योंकि भारत की आत्मा कभी मरी नहीं है।


यही हमारा धर्म है और हमारा इतिहास भी है,जिसके तहत हिंदू भारत की संस्कृति सत्य और अहिंसा है और बीजमत्र फिर वहीं बुद्धम् शरणम् गच्छामि है।


मजहबी सियासत हिंदुत्व नहीं है और न मनुस्मृति हिंदुत्व है।

बौद्धधर्म का अवसान जरुर हुआ है लेकिन भारत की बौद्धमय इतिहास ही भारत की विरासत है सत्य और अहिंसा की।


फासिस्ट सत्ता ने खुद को लामबंद कर लिया है सत्य और अहिंसा की विरासत के खिलाफ और भारत की आत्मा को कुचलने चली है।


बहरहाल अनुपम खेर अभिनेता बेहद अच्छे हैं।उनकी पहली फिल्म आगमन के बाद नायक से चरित्र अभिनेता बने अनुपम हर किरदार में फिटमफिट हैं।


वैसे अभिनेत्री जयललिता भी बहुत अच्छी रही हैं।


अतुल्य भारत विज्ञापन में आमीर का सहिष्णुता विकल्प अमिताभ बच्चन भी हमारे छात्र जीवन से आज तलक अभिनय से जब तब कायल करते रहे हैं।


अभिनेता हमारे हिसाब से परेश रावल भी कम बड़े नहीं हैं और निदेशक श्माम बेनेगल की तो कोई सानी नहीं हैं।


राजनीति में अभिनय बड़े काम की चीज है।


जबसे भारत की राजधानी नागपुर में स्थानातंरित है,तब से पाठ हूबहू निभाने वाले अभिनेताओं और अभिनेत्रियां भारतीय राजनीति में सोने पर सुहागा हैं।यही राजनीतिक  मार्केटिंग है मुक्त बाजार।


हम सारे लोग जानते हैं कि परदे पर उनका किरदार असल में उनका अपना किरदार होता नहीं हैं और न संवाद उनके अपने होते हैं और जो गीत उनपर फिल्माये जाते हैं,वे भी उनके नहीं होते हैं।


ऐसे रंग बिरंगे किरदार का हुनर अब भारतीय केसरिया सत्ता का सबसे बड़ा आकर्षण हैं।क्योंकि मुख्यालय नियंत्रित अखबारों में विज्ञापनों के अलावा मौलिक जैसा कुछ नहीं होता,वैसे ही राजनीति के परदे पर मौलिक संवाद भी कुछ नहीं होता।


यथार्थ सिर्फ राजनीतिक समीकरण होते हैं।


यही फासिज्म का राजकाज है।



Mumbai protest rally against institutional murder of Rohith Vemula

From Byculla to Vidhan Bhavan, Mumbai on 1st February, 2016

Justice for Rohith Vemula - Joint Action Committee (JAC), Mumbai, Maharashtra

February 1st 2016: Students, worker, social and political activists held a protest rally today from Rani Bagh in Byculla towards the Vidhan Sabha under the banner of "Justice for Rohit - Joint Action Committee, Mumbai" under the guidance of Adv. Prakash Ambedkar. Students from IIT-Bombay, Mumbai University, Tata Institute of Social Sciences, Tata Institute of Fundamental Research, Nirmala Niketan, Siddharth College, Govt Law College, Ruparel College, St. Xavier's college, International Institute of Population Sciences, Vivekananda College, Ambedkar College, and many others are part of the front. Several progressive political forces, cultural groups and local organisations have also joined in. Some four thousand people joined the protest calling for justice for Rohith and for democratisation of Higher Education in the country. The hundreds of protestors who started the rally from Rani Bagh Maidan were also joined by people from the neighbourhood on the way. The rally continued till the Chakrapathi Shivaji Terminus where the police blocked the protestors where they assembled and occupied the road opposite to the CST station. The rally continued till 5:30 pm in the evening and culminated in CST.

The protestors demanded the culprits behind the institutional murder of Rohith including the Vice Chacellor Appa Rao, Union Ministers Smriti Irani, Bandaru Dattatreya, Ramachandra Rao (BJP MLC), Susheel Kumar (ABVP President) etc be arrested and booked under SC/ST prevention of Attrocities (PoA) Act. Other demands included that the Vice Chancellor be immediately removed, Rohith's family be compensated with 50 lakhs, an judicial enquiry be instituted to look into this case and other caste discriminatory practices in Higher Educational institutions.

The rally was addressed by Adv. Prakash Ambedkar who said that the issue in University of Hyderabad started after the pressure the government (including Union minister Smriti Irani which resulted in the expulsion of the students even after a earlier committee found no wrong doing. He said that there needs to be proper investigation in this matter and cases should be filed against the culprits . He called for further agitations in this issue across Maharashtra and said that this is just a start in the capital city. He warned that if the government does not take any action, then people will be forced to.

Dontha Prashant, Rohith's friend and one of the five expelled students in University of Hyderabad also addressed the gathering and detailed the circumstances under which the five Dalit research Scholars were expelled in HCU after pressure from the Union Minister Bandaru Dattatreya and others. He said that Rohith was fighting against the same Brahmanical forces that ultimately lead to his suicide. He read from Rohith suicide note which hoped for a new beginning, a red sun raising in blue sky, which can shine on the darkness of the saffron that has spread across the nation. Ms. Suvarna Salve, a Dalit student activist part of Samatha Vidyarthi Agadi also said, "There are lot of agitations going on around the country related to the injustices against Dalits and other marginalised sections. RSS and BJP are in power and are perpetuating the injusices, for example the banning of Ambedkar Periyar Study Circle in IIT-M, the appointment of their supporter in FTII. While the rich and the powerful politicians are ruling the nation, there is severe budget cuts in education, for example the Tribal Hostel in Panvel where the students went on strike last year does not even have minimal facilities. There is a need for all students and others to join the fight against this injustice.

Justice for Rohith- Joint Action Committee, Mumbai also submitted a memorandum of demands to the Governor (State of Maharashtra) asking for the demands to be forwarded to the President.

Justice for Rohith-Joint Action Commitee Mumbai's photo.

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Yesterday at 8:30pm



Candle lit in front of Asiatic Library Mumbai in the memory of Rohit Vemula

'मुंबई के विख्यात एशियाटिक लायब्ररी के सामने रोहित वेमुला कि याद मे मोम्बात्तीया जलाकर आदरांजली अर्पित की गयी !'

'मुंबई के विख्यात एशियाटिक लायब्ररी के सामने रोहित वेमुला कि याद मे मोम्बात्तीया जलाकर आदरांजली अर्पित की गयी !'

'मुंबई के विख्यात एशियाटिक लायब्ररी के सामने रोहित वेमुला कि याद मे मोम्बात्तीया जलाकर आदरांजली अर्पित की गयी !'

'मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर रोहित वेमुला कि याद मे मोम्बात्तीया जल कर युवकोने आदरांजली दी !'

'long live Rohit Vemula.  मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर रोहित वेमुला कि याद मे मोम्बात्तीया जल कर युवकोने आदरांजली दी !'



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खैरलांजी कत्लेआम पर आनंद तेलतुंबड़े की किताब परसिस्टेंस ऑफ कास्ट के बारे में जानी मानी लेखिका अरुंधति रॉय का कहना है:‘इक्कीसवीं सदी में एक दलित परिवार का सरेआम, एक अनुष्ठान की तरह किया गया कत्लेआम हमारे समाज के सड़े हुए भीतरी हिस्से को दिखाता है...यह अवशेष के रूप में सामंतवाद के आखिरी दिनों के बारे में एक किताब नहीं है, बल्कि इसके बारे में है कि भारत में आधुनिकता का क्या मतलब है.’ यह बात सिर्फ उक्त किताबके बारे में ही नहीं, तेलतुंबड़े के पूरे लेखन के बारे में भी सही है. तेलतुंबड़े का लेखन भारत में एक आधुनिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुखौटे में छिपे सामंती, ब्राह्मणवादी चेहरे को उजागर करता है. वे दिखाते हैं कि कैसे भारत में अमल में लाई जा रही लोकतंत्र जैसी आधुनिक प्रणाली असल में ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद द्वारा एक साथ मिल कर भारतीय अवाम के सबसे बदहाल हिस्सों के शोषण और उत्पीड़न के औजार के रूप में काम करती है. तेलतुंबड़े इस शोषण के खिलाफ विकसित हुई वैचारिकियों और आंदोलनों की समस्याओं पर भी आलोचनात्मक निगाह डालते हैं. वे एक तरफ जहां मार्क्सवादियों द्वारा भारतीय समाज में जाति और वर्ग के


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खैरलांजी कत्लेआम पर आनंद तेलतुंबड़े की किताब परसिस्टेंस ऑफ कास्ट के बारे में जानी मानी लेखिका अरुंधति रॉय का कहना है:'इक्कीसवीं सदी में एक दलित परिवार का सरेआम, एक अनुष्ठान की तरह किया गया कत्लेआम हमारे समाज के सड़े हुए भीतरी हिस्से को दिखाता है...यह अवशेष के रूप में सामंतवाद के आखिरी दिनों के बारे में एक किताब नहीं है, बल्कि इसके बारे में है कि भारत में आधुनिकता का क्या मतलब है.'
यह बात सिर्फ उक्त किताबके बारे में ही नहीं, तेलतुंबड़े के पूरे लेखन के बारे में भी सही है. तेलतुंबड़े का लेखन भारत में एक आधुनिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुखौटे में छिपे सामंती, ब्राह्मणवादी चेहरे को उजागर करता है. वे दिखाते हैं कि कैसे भारत में अमल में लाई जा रही लोकतंत्र जैसी आधुनिक प्रणाली असल में ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद द्वारा एक साथ मिल कर भारतीय अवाम के सबसे बदहाल हिस्सों के शोषण और उत्पीड़न के औजार के रूप में काम करती है. 
तेलतुंबड़े इस शोषण के खिलाफ विकसित हुई वैचारिकियों और आंदोलनों की समस्याओं पर भी आलोचनात्मक निगाह डालते हैं. वे एक तरफ जहां मार्क्सवादियों द्वारा भारतीय समाज में जाति और वर्ग के दो अलग अलग दायरे बना कर उन्हें एक दूसरे में समोने की कोशिशों की समस्याओं को रेखांकित करते हैं, वहीं दूसरी तरफ जाति विरोधी आंदोलनों द्वारा साम्राज्यवादी शोषण और आर्थिक मुद्दों की अनदेखी किए जाने के बुरे नतीजों पर भी विचार करते हैं. साथ ही, उनकी कोशिश आरक्षण के जटिल और नाजुक मुद्दे पर एक बारीक और सही समझ तक पहुंचने की है. तेलतुंबड़े ने मार्क्सवाद और आंबेडकरी वैचारिक नजरिए,दोनों की ही सीमाओं का विस्तार करते हुए, बाबासाहेब आंबेडकर को देखने का एक सही नजरिया विकसित करने की कोशिश करते हैं.
Desh Nirmohi's photo.
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শিশুরা ভালো নেই! চাষার পো শরণার্থী আমি সেই শিশু যে হারিয়েও হারাইনি! ইউরোপে যাওয়া ১০ হাজার শরণার্থী শিশু নিখোঁজ! পলাশ বিশ্বাস



শিশুরা ভালো নেই!

চাষার পো শরণার্থী আমি সেই শিশু যে হারিয়েও হারাইনি!

ইউরোপে যাওয়া ১০ হাজার শরণার্থী শিশু নিখোঁজ!



পলাশ বিশ্বাস


মৃত পৃথিবী


পৃথিবী কি আজ শেষে নিঃস্ব

ক্ষুধাতুর কাঁদে সারা বিশ্ব,

চারিদিকে ঝরে পড়া রক্ত,

জীবন আজকে উত্যক্ত ।

আজকের দিন নয় কাব্যের

পরিণাম আর সম্ভাব্যের

ভয় নিয়ে দিন কাটে নিত্য,

জীবনে গোপন-দু্র্বৃত্ত ।

তাইতো জীবন আজ রিক্ত,

অলস হৃদয় স্বেদসিক্ত;

আজকে প্রাচীর গড়া ভিন্ন

পৃথিবী ছড়াবে ক্ষতচিহ্ন ।

অগোচরে নামে হিম-শৈত্য,

কোথায় পালাবে মরু দৈত্য ?

জীবন যদিও উৎক্ষিপ্ত,

তবু তো হৃদয় উদ্দীপ্ত,

বোধহয় আগামী কোনো বন্যায়,

ভেসে যাবে অনশন, অন্যায় ॥


সুকান্ত ভট্টাচার্যকে মনে পড়ে?


শুধু কি আইলান হারায়?

দুর্মুখ আমি,নিস্পাপ শিশুদের মুখে মুখে ফুটে থাকা লাল গোলাপে  আমি ঔ হারিয়ে যাওয়া এই পৃথীবীর সমস্ত শিশুদের মিছিল দেখতে পাই আর জীবন যাপন দুঃস্বপ্ন হয়ে যায়!অথচ এই বাংলাই এক অকাল প্রয়াত কবি ঝলসানো চাঁদে রুটির ছবি দেখতে দেখতে প্রতিজ্ঞা করেছিলনে ভবিষত প্রজন্মের কাছে,পৃথীবীতে যেন ভালো থাকে শিশুরা!


শিশুরা ভালো নেই!তরতরিযে বেড়ে ওঠার বিজ্ঞাপন,হাগিস ও তামাম রং বেরংবাজারি উপকরণের মধ্যেও শিশুরা হারিয়ে যায়!শিশু ও কিশোরেরা বিভিন্ন অপরাধী চক্রের দ্বারা যৌন নিপীড়ন ও দাসত্বের শিকার হচ্ছে বলেও সতর্ক করে দিয়েছে তারা।ইহা এই ভারতবর্ষে নোবেল শান্তি পুরস্কারের অপর পিঠ!



বিভক্ত দুই বাংলার মাঝখানে সেই বধ্যভূমি,যেখানে অনাম শিশুদের সব মিছিল হারিয়ে যায় এবং তাঁদের কোনো খবর হয় না!


এই ধর্ষণ ভূমিতে,ধর্ষণ সুনামিতে মায়ের গর্ভ চিরে শিশুহত্যা বাংলাদেশ যুদ্ধে বেয়নেটে বিদ্ধ শিশুদের ছবি,সোমনাথ হোড়ের দুর্ভিক্ষের ছবি এবং কাঁটাতারে ঝোলানো ফেলানির লাওয়ারিশ লাশের ছবিগুলোকে ম্লন করে দিয়ে পৃথীবীর সমস্ত শিশুকে হত্যা করার চক্রানতে আজ গৌরিকায়ন!

জাহারই মধ্যে পিপিপি মুক্তবাজারি উন্নয়নে নারী পাচার শিশু পাচার একমাত্র শিল্প,অপরাধকর্ম অর্থ ব্যবস্থা,অবাধ লুন্ঠন সংস্কার!


মরিচঝাঁপির সেই সব শিশুদের মধ্যে আমায় লাশ হয়ে ভেসে যেতে হয়নি!সীমান্ত পারাপারে লাশ হয়ে যেতে হয়নি!


তবু আমি সেই শিশু,চাষার পো শরণার্থী আমি সেই শিশু যে হারিয়েও হারাইনি!সংবাদে প্রকাশ,ইউরোপে পৌঁছানোর পর গত দুই বছরে 'হারিয়ে গেছে' ১০ হাজারের বেশি শরণার্থী শিশু।


ইউরোপীয় ইউনিয়ন (ইইউ) পুলিশের গোয়েন্দা ইউনিট ইউরোপোল এ কথা বলেছে। খবর বিবিসির।


ইউরোপোল জানিয়েছে, বিভিন্ন দেশ থেকে এসব শিশু ইউরোপে আসার পর বিভিন্ন দেশের কর্তৃপক্ষের কাছে শরণার্থী হিসেবে নিবন্ধন করে।

এরপরই তারা নিরুদ্দেশ হয়ে গেছে। শিশু ও কিশোরেরা বিভিন্ন অপরাধী চক্রের দ্বারা যৌন নিপীড়ন ও দাসত্বের শিকার হচ্ছে বলেও সতর্ক করে দিয়েছে তারা।


বিভিন্ন অপরাধী চক্রের খপ্পরে পড়ে ইউরোপে শরণার্থী শিশু ও কিশোরেরা নিরুদ্দেশ হয়ে যাচ্ছে বলে আগে থেকেই অনুমান করা হয়েছিল। কিন্তু ইউরোপজুড়ে কত শিশু এমন ঘটনার শিকার হয়েছে, সে বিষয়ে এই প্রথম ইউরোপোল তথ্য দিল।


ইউরোপোলের প্রধান কর্মকর্তা অবজারভার পত্রিকাকে বলেন, 'এটা বলা অযৌক্তিক হবে না যে আমরা ১০ হাজারের বেশি শিশুর খোঁজ করছি।


তাদের সবাই অপরাধীদের খপ্পরে পড়েছে, তা নয়। কাউকে কাউকে হয়তো পরিবারের সদস্যদের কাছে পৌঁছে দেওয়া হয়েছে। কিন্তু তারা কোথায় আছে, আমরা সেটা জানি না।'

এর আগে গত বছরের মে মাসে ইতালির কর্মকর্তারা বলেছিলেন, তাঁদের বিভিন্ন আশ্রয়কেন্দ্র থেকে প্রায় পাঁচ হাজার শিশু নিরুদ্দেশ হয়ে গেছে।




শরণার্থী কাহারে কয়?

উইকিপিডিয়া, মুক্ত বিশ্বকোষ থেকে

২০০৬ সালে দক্ষিণ লেবাননে অবস্থানকারী লেবাননীয় শরণার্থী

শরণার্থী বা উদ্বাস্তু (ইংরেজি: Refugee) একজন ব্যক্তি যিনি নিজ ভূমি ছেড়ে অথবা আশ্রয়েরসন্ধানে অন্য দেশে অস্থায়ীভাবে অবস্থান করেন। জাতিগত সহিংসতা, ধর্মীয় উগ্রতা, জাতীয়তাবোধ,রাজনৈতিক আদর্শগত কারণে সমাজবদ্ধ জনগোষ্ঠীর নিরাপত্তাহীনতায় আক্রান্তই এর প্রধান কারণ। যিনি শরণার্থী বা উদ্বাস্তুরূপে স্থানান্তরিত হন, তিনি আশ্রয়প্রার্থী হিসেবে পরিচিত হন। আশ্রয়প্রার্থীব্যক্তির স্বপক্ষে তার দাবীগুলোকে রাষ্ট্র কর্তৃক স্বীকৃত হতে হবে।[১]

৩১ ডিসেম্বর, ২০০৫ সাল পর্যন্ত আফগানিস্তান, ইরাক, সিয়েরালিওন, মায়ানমার, সোমালিয়া, দক্ষিণ সুদান এবং ফিলিস্তিন থেকে বিশ্বের প্রধান শরণার্থী উৎসস্থল হিসেবে পরিচিতি পেয়েছে।[২] আইডিপিঅনুযায়ী বিশ্বের সবচেয়ে বেশী শরণার্থী ব্যক্তি এসেছে দক্ষিণ সুদান থেকে প্রায় ৫ মিলিয়ন। জনসংখ্যাঅনুপাতে সবচেয়ে বেশী আইডিপি রয়েছে আজারবাইজানে। সেখানে ২০০৬ সালের তথ্য মোতাবেক প্রায় আট লক্ষ শরণার্থী অন্যত্র আশ্রয় নিয়েছে।[৩]


সংজ্ঞার্থ নিরূপণ[সম্পাদনা]

১৯৫১ সালে জাতিসংঘ কর্তৃক শরণার্থীদের মর্যাদা বিষয়ক সম্মেলনে অনুচ্ছেদ ১এ-তে সংক্ষিপ্ত আকারে শরণার্থীর সংজ্ঞা তুলে ধরে। একজন ব্যক্তি যদি গভীরভাবে উপলদ্ধি করেন ও দেখতে পান যে, তিনি জাতিগত সহিংসতা, ধর্মীয় উন্মাদনা, জাতীয়তাবোধ, রাজনৈতিক আদর্শ, সমাজবদ্ধ জনগোষ্ঠীর সদস্য হওয়ায় ঐ দেশের নাগরিকের অধিকার থেকে দূরে সরানো হচ্ছে, ব্যাপক ভয়-ভীতিকর পরিবেশ বিদ্যমান, রাষ্ট্র কর্তৃক পর্যাপ্ত নিরাপত্তা দিতে ব্যর্থ হচ্ছে; তখনই তিনি শরণার্থী হিসেবে বিবেচিত হন।[৪] ১৯৬৭ সালের সম্মেলনের খসড়া দলিলে উদ্বাস্তুর সংজ্ঞাকে বিস্তৃত করা হয়। আফ্রিকাল্যাটিন আমেরিকায় অনুষ্ঠিত আঞ্চলিক সম্মেলনে যুদ্ধ এবং অন্যান্য সহিংসতায় আক্রান্ত ব্যক্তি কর্তৃক নিজ দেশত্যাগ করাকেও অন্তর্ভূক্ত করা হয়।

এ সংজ্ঞায় শরণার্থীকে প্রায়শঃই ভাসমান ব্যক্তিরূপে অন্তর্ভূক্ত করা হয়। সম্মেলনে গৃহীত সংজ্ঞার বাইরে থেকে যদি যুদ্ধের কারণে নির্যাতন-নিপীড়নে আক্রান্ত না হয়েও মাতৃভূমি পরিত্যাগ করেন অথবা, জোরপূর্বক নিজ ভূমি থেকে বিতাড়িত হন - তাহলে তারা শরণার্থী হিসেবে বিবেচিত হবেন।[৫]


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Monday, February 1, 2016

Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna ऐसे भी मुझे इस्लाम की मान्यताओं और परम्पराओं का न्यूनतम ज्ञान है । उन पर कोई टीप करने से पहले मुझे इस्लाम पढ़ना पड़ेगा । और इस्लाम पढ़ने के बाद हो सकता है कि मैं मुसलमान हो जाऊं । क्या मेरे धर्म बन्धु ऐसा चाहेंगे ? क्योंकि शंकराचार्य को भी मण्डन मिश्र की भार्या के रति सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर देने के लिए सद्यह मृत व्यक्ति की देह में दाखिल हो उसकी बीबी के साथ सोना पड़ा था । एक और तोगड़िया जी की चिंता है कि मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है । ऐसे में वह भी क्योंकर मुझे मुसलमान होने देना चाहेंगे ।

Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna

कुछ मित्र मुझे निरन्तर उलाहना दे रहे हैं कि मैं मुस्लिम महिलाओं के हिज़ाब प्रकरण पर क्यों चुप हूँ , जबकि हिन्दू रीति रिवाजों पर आये दिन झींकता रहता हूँ । मेरा उत्तर है - ठीक उसी तरह चुप हूँ , जैसे कि किसी मित्र की गर्दन में दर्द होने पर दवा मुझे नहीं , बल्कि उसी को खानी होती हैं । पहली बात यह कि मैं महिला नहीं हूँ । और आखिरी बात यह की मैं मुस्लिम नहीं हूँ ।मैं तो यह भी तय नहीं कर सकता कि उसे दर्द है भी , या नहीं । " अंधा बांटे रेवड़ी , अपनों को ही दे । " मेरे पास व्यंग्य , उपहास और कटाक्ष की जो कड़वी रेवड़ी है , वह उन्हीं धर्मालम्बियों के लिए हैं , जिससे मेरा नाता है । बच जायेगी , तभी औरों को दूंगा ।
ऐसे भी मुझे इस्लाम की मान्यताओं और परम्पराओं का न्यूनतम ज्ञान है । उन पर कोई टीप करने से पहले मुझे इस्लाम पढ़ना पड़ेगा । और इस्लाम पढ़ने के बाद हो सकता है कि मैं मुसलमान हो जाऊं । क्या मेरे धर्म बन्धु ऐसा चाहेंगे ? क्योंकि शंकराचार्य को भी मण्डन मिश्र की भार्या के रति सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर देने के लिए सद्यह मृत व्यक्ति की देह में दाखिल हो उसकी बीबी के साथ सोना पड़ा था । एक और तोगड़िया जी की चिंता है कि मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है । ऐसे में वह भी क्योंकर मुझे मुसलमान होने देना चाहेंगे ।
( चित्र सौजन्य - मित्र निलेश )


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সহস্রাব্দের সেরা মনিষী : ডঃ বি আর আম্বেদকর শরদিন্দু উদ্দীপন

সহস্রাব্দের সেরা মনিষী : ডঃ বি আর আম্বেদকর
শরদিন্দু উদ্দীপন 

এই আলোচনার শুরুতেই পাকিস্তানের ভূতপূর্ব প্রধান মন্ত্রী জুলফিকার আলি ভূট্টোর ফাঁসির আগের দিনের (৩রা এপ্রিল, ১৯৭৯) একটি বিরলতম বক্তব্যের উল্লেখ করা সমীচীন মনে করছি। , The New York Times ৪ঠা এপ্রিল যে বক্তব্যটি প্রকাশিত করে। ভুট্টো সাহেব কৌতুকের সাথে বলেছিলেন, " জিয়া-উল-হক আমাকে ফাঁসি দেবে কারণ এখানে মিলিটারী রাজ কায়েম হয়েছে। ১৯৪৭ সালে মুসলমানরা পেয়েছে পাকিস্তান আর হিন্দুরা পেয়েছে ইন্ডিয়া। অবশ্যই আমরা স্বাধীনতা স্বরূপ পাকিস্তান নামক ভূখণ্ড পেয়েছি; কিন্তু হায়! আম্বেদকর নামক মহামানবের পথ অনুসরণ করে জ্ঞান ইন্ডিয়ার সাথে মিলিত হয়েছে। আম্বেদকর মহম্মদ আলি জিন্নাকে ভারত ভাগ না করার জন্য অনুরোধ করেছিলেন। কিন্তু তাঁর সতর্ক বানী জিন্না উপেক্ষা করেছিলেন। আম্বেদকর ছিলেন কাল দ্রষ্টা। তিনি জানতেন যে, স্বাধীনতা সহজে পাওয়া যায়, কিন্তু শাসন পরিচালনা করা, গণতান্ত্রিক সংবিধান প্রবর্তন করার জন্য প্রয়োজন হয় জ্ঞানের এবং এই জ্ঞান সহজ লভ্য নয়। পাকিস্তানের নেতারা জ্ঞান লব্ধ করতে পারেনি যা আম্বেদকর অর্জন করেছিলেন"। আনন্দের কথা যে, মুসলমানেরা পাকিস্তান পেয়েছে। কিন্তু জ্ঞানের অভাবে পাকিস্তানের সংবিধানে থেকে গেছে দুর্বলতা ও অসংখ্য ছিদ্র এবং স্বৈরতান্ত্রিক পরিকাঠামো। এই স্বৈরতান্ত্রিক পরিকাঠামোয় রাজা হলেন সিংহ আর জনগণ হলেন মেষ। সিংহ যে কোন মেষকে ভক্ষণ করতে পারে।...কিন্তু মহাজ্ঞানী আম্বেদকর অসাধারণ প্রজ্ঞায় সংবিধান রচনা করে ভারতকে রক্ষা করেছেন এবং জ্ঞানকে জনগণের মধ্যে সঞ্চালিত করেছেন"। (Ref : Dalit Voice, 1-15 June, 2005, ) 
ভারতীয় রিজার্ভ ব্যাঙ্কের গোড়ার কথাঃ 
কিছুদিন আগে (২৮শে মে ২০১১) গোয়া থেকে প্রকাশিত "দি নভহিন্দ টাইমস" নামে একটি পত্রিকায় আর সি রাজামনির The Less Known Side of B. R Ambedkar নামক একটি প্রবন্ধ প্রকাশিত হয়। এই প্রবন্ধে তিনি উল্লেখ করেন যে, বিংশ শতকের গোড়া থেকেই ভারতের অর্থনীতি ও মুদ্রা ব্যবস্থা একটি ভয়ঙ্কর সমস্যার সম্মুখীন হয়েছিল। এই সমস্যা সমাধান করার জন্য ব্রিটিশ সরকার Hilton Young Commission গঠন করেন। এই কমিশন যখন ভারতবর্ষে আসেন তখন কমিশনের সদস্যদের হাতে হাতে ডঃবিআর আম্বেদকরের লেখা "The Problem of the Rupee – Its origin and its solution." ঘুরতে দেখা যায়। বাবা সাহেব হিল্টন কমিশনের সামনে তাঁর লেখা "Evidence before the Royal Commission on Indian Currency and Finance" এবং "The Problem of the Rupee – Its origin and its solution." থেকে বক্তব্য রাখেন। তিনি অকপটে বলেন যে, "অর্থনৈতিক ও সামাজিক শোষণের অন্তরায় সমস্ত উপাদানগুলিকে দূর করতে হবে। আমরা জমিদারতন্ত্রের দখলদারী ও ভূমিহীন সর্বহারা শ্রমিক দেখতে চাইনা। আদর্শ অর্থনীতির ভিত্তি হল স্বাধীনতা ও কল্যাণ। পুঁজিপতিদের দ্বারা পরিচালিত সামজিক ও অর্থনৈতিক ভারসাম্যহীন উৎপাদনের পরিসমাপ্তি ঘটাতেই হবে"।
সংসদে এই বক্তব্য গৃহীত হয় এবং ১৯৩৪ সালে আরবিআই অ্যাক্ট পাশ হয়। অর্থাৎ বাবা সাহেবের প্রদর্শিত পথেই অর্থনৈতিক ও মূদ্রা ব্যবস্থার গতিমুখ পুঁজিপতি কেন্দ্রীক প্রবণতা থেকে জনমুখী বাস্তবতায় পরিণত হয়। এমন জনমুখী অর্থনৈতিক নীতি নির্ধারণের ফলেই রাষ্ট্রীয় সমস্ত সম্পদের ভাগীদার হয়ে ওঠে জনগণ। রাষ্ট্র হয়ে ওঠে নিয়ন্ত্রক শক্তি। এখানে বলে রাখি যে আম্বেদকর তাঁর মাষ্টার ডিগ্রীর জন্য Ancient Indian Commerce' এর উপরে থিসিস করেন এমএসসিতে থিসিস করেন 'The Evolution of Provincial Finance in British India' এর উপর এবং ডিএসসি তে "The Problem of the Rupee – Its origin and its solution." নিয়ে গবেষণা পূর্ণ করেন।
Tribute to Dr. Ambedkar at Columbia University:
আর একটি মহান ঘটনার কথা এখানে উল্লেখ করছি এই কারণে যে এই ঘটানার মাধ্যমে ডঃ বি আর আম্বেদকর এমন উচ্চতায় প্রতিষ্ঠিত হন যে তাঁর অতিবড় সমালোচকেরাও বিস্ময়ে হতবাক হয়ে যান। কারণ অনেক সামালোচকই তখন পর্যন্ত বাবাসাহেবকে জাতীয় নেতা হিসেবেও মেনেনিতে দ্বিধা করতেন। তারা আম্বেদকরকে একটি প্রাদেশিক নেতা হিসেবে প্রচার করতে ভালবাসতেন। ঘটনাটি ২০১০ সালের (Tribute to Dr Ambedkar at Columbia University: Prof. Nicolas Dirks, http://c250.columbia.edu/…/remarkable…/bhimrao_ambedkar.html published: 04 Nov 2010)। 
এই সময় আমেরিকার কলোম্বিয়া বিশ্ববিদ্যালয়ের ২৫০ বছরের ইতিহাসের উপর একটি গবেষণা মূলক সমীক্ষা চালায়। কলোম্বিয়া বিশ্ববিদ্যালয় থেকে স্নাতক সম্মান লাভ করেছেন এরকম ৬৪ জন জগৎবিখ্যাত মনিষীর মধ্যে এই সমীক্ষা চালানো হয়। ২০১০ সালের ১৫ এপ্রিল রাত ৮ঃ০৫ টায় একটি ওয়েব সাইট থেকে আমরা জানতে পারি যে, এই জগত বিখ্যাত শ্রেষ্ঠ মনিষীদের মধ্যে যিনি সর্ব প্রথম স্থান অধিকার করেছেন তিনি বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকর। এযুগের বোধিসত্ব। কসমিক মার্গ দর্শনের একনিষ্ঠ পরিব্রাজক। 
যার ওয়েবসাইট থেকে আমরা এখবর জানতে পারি তিনি প্রফেসর গেইল ওমভেট। যিনি বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের জীবন ও আদর্শের উপর পি এইচ ডি করেছেন এবং আমেরিকার সম্ভ্রান্ত পরিবারের বৈভব ছেড়ে দিয়ে আম্বেদকর এবং গোতমা বুদ্ধের জ্ঞান সমুদ্রের সন্ধানে নিজেকে উৎসর্গ করেছেন। মহারাষ্ট্রে এসে দীর্ঘদিন গবেষণা করেছেন এবং মারাঠি সন্তান ডঃ পতঙ্কর কে বিয়ে করে আম্বেদকরের জীবনাদর্শকে সর্বশ্রেষ্ঠ স্থানে তুলে ধরছেন। তিনি কৃতজ্ঞ চিত্তে উল্লেখ করেছেন যে এই মহামানবদের প্রদর্শিত পথেই আছে পৃথিবী ও মানুষের নিশ্চিত কল্যাণের পথ। There is no parallel to these philosophies". ২০১২ সালের ১০ই জুলাই, London School of Economics সারা বিশ্বের একজন সেরা মনিষী হিসেবে সম্মানিত করে। ঠিক একই বছরে Oxford University তাঁকে ১০০০ বছরের সেরা মনীষী হিসেবে সম্মানিত করে। কিন্তু এই খবরটি চক্রান্তকারীরা হ্যাক করে দেয়। 
এর পরেই সিএন আই বি এন এবং দি হিষ্ট্রি চ্যানেল আয়োজিত জনমতের ভিত্তিতে একটি প্রতিযোগিতা আয়োজিত হয় ভারতবর্ষে। এই অনুষ্ঠানের নাম ছিল The Greatest Indian After Gandhi (জনান্তিকে বলে রাখি এই বিতর্ক শুরু হয়েছিল মাত্র দুজন মানুষের মধ্যে। এরা ছিলেন মোহন দাস করমচাঁদ গান্ধী ও ডঃ ভীম রাও রামজী আম্বেদকর। জনমতের ভিত্তিতে গান্ধী কেবল ২২% ভোট পায়। এবং বাবা সাহেব পান ৭৮% ভোট। কোন অজ্ঞাত কারণে সেই প্রক্রিয়াটি বাতিল হয় এবং পরে গান্ধীকে বাদ দিয়ে ভারতের ৫০ জন ব্যক্তিকে The Greatest Indian এর তালিকায় রাখা হয়।)
২০১২ সালের ১১ই আগস্ট। সাবানা আজমী, অমিতাভ বচ্চন সহ সমস্ত জুরীদের বিচারে বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকর কে The Greatest Indian হিসেবে ঘোষণা করা হয়।
কিন্তু এর পরেও কি প্রতিক্রিয়াশীলরা বাবা সাহেবের বিরুদ্ধে তাদের চক্রান্ত বন্ধ করেছেন? মেনে নিয়েছেন তার শ্রেষ্ঠত্ব? আমরা যদি এমন মনে করে থাকি তা হবে বাস্তব থেকে আমাদের দূরে থাকার একটি নির্মম পরিহাস। আমরা যা বরাবরই করে এসেছি বা করতে ভালবাসি। আর আমাদের এই নির্লিপ্ততার বা অজ্ঞতার পূর্ণ সুযোগ নিয়ে প্রতিক্রিয়াশীলেরা বাবা সাহেবকে সাম্রাজ্যবাদীদের মদতদাতা হিসেবে প্রমান করার চরম খেলায় মেতে উঠেছে। এরকম দুটি খেলার প্রামান্য উদাহরণ আমি এর আগের লেখাগুলিতে আপনাদের সামনে তুলে ধরার চেষ্টা করেছি। তার খানিকটা এই আলোচনার সাথেও সংযোজন করলাম।
ডঃ বি আর আম্বেদকরের ভাগিদারী দর্শনঃ 
ভারতীয় বহুজন সমাজ জাতপাতের কারণেই বঞ্চনার স্বীকার । হিন্দু বর্ণ ব্যবস্থায় সংখ্যা গরিষ্ঠ মানুষকেই জাতের জাঁতাকলে সর্বহারা করা হয়েছে যুগ যুগ ধরে। জাতপাতকে ধর্মীয় মহিমা দিয়ে মুষ্টিমেয় কিছু মানুষ রাষ্ট্রীয় উৎপাদনের প্রায় সবটাই আত্মসাৎ করছে। যে রাজনীতির পেষা কলে ফেলে সংখ্যা গরিষ্ঠ মানুষকে শুধু সম্পদ থেকে বঞ্চিত করা হয়নি,মর্যাদাহীন করে পশুসুলভ জীবন যাপন করতে বাধ্য করা হয়েছে। বঞ্চিতের আত্ম বিকাশের অন্তরায়,শোষণ যন্ত্রের এই জগদ্দল পাথরটাকে গুড়িয়ে দেওয়াই আম্বেদকরের মিশন । 
বহুজনের পারস্পরিক সহাবস্থানের ভিত্তিতে বিভেদের শেকড় সমূলে উৎপাটন করার কথা বলে এই দর্শন। আম্বেদকর দর্শণের এটাই সব থেকে বড় মূলধন।
এই মিশন "Survival for the fittest"নয় । নয় struggle for exhistance এর উন্মত্ত রণহুঙ্কার। বা প্রতিশোধ পরায়ণ ক্ষমতা দখলের দস্তাবেজ । যে লড়াইয়ের অন্য প্রান্তে অবস্থান করে শ্রেণী শ্ত্রু। যাকে রণনীতি বা রণকৌশলের রক্তক্ষয়ী সংগ্রামের মাধ্যমে পরাভূত করে প্রোলেতারিয়েতের শাসন কায়েম করতে হয় । এই আদিম হিংস্র মানবিকতার বৈদেশিক ব্যখ্যা আম্বেদকরবাদে জায়গা পায়নি। বরং পরম মিত্রতা বা ভাইচারাই চিরস্থায়ী ভাবে বৈরিতার অবসান ঘটাতে পারে, ভারতীয় দর্শনের এই অমর বাণী তিনি মেনে নিলেন।
সমাজ বিবর্তনের ইতিহাসে বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদ করের মতাদর্শ কালের এক অনিবার্য ভবিষ্যলিপি। এ মতাদর্শ শুধুমাত্র ভারতবর্ষে নয় বরং সমগ্র পৃথিবীর মঙ্গল বার্তা হিসেবে প্রতিধ্বনিত হচ্ছে। পৃথিবীর সর্বজনের কল্যাণে ক্রমপ্রকাশিত এই আলোক বর্তিকা যে মহামিলনের এক ক্ষেত্রে পরিণত হবে তার আভাস কিন্তু পাওয়া যাচ্ছে দিকে দিকে।
এতে প্রোমাদ গুনতে শুরু করেছে মনুবাদীরা। যাদের এক এবং অদ্বিতীয় এজেন্ডা বর্ণ ব্যবস্থা কায়েম রাখা। এবং আম্বেদকর নির্মিত ভারতীয় সংবিধান সম্পূর্ণ ধ্বংস করে মনুস্মৃতিকে সংবিধান হিসেবে প্রতিষ্ঠা করা। 
সাম্প্রতি বিজেপির ঘোষিত প্রধান মন্ত্রী পদের দাবিদার গুজরাট গণহত্যার নায়ক মোদির ভাষণে এই জায়নবাদী যুদ্ধের দামামা আমরা শুনতে পেয়েছি। শুরু হয়েছে হুঁকার র্যাবলি।
কিন্তু সব থেকে অবাক করে দিয়েছে বামপন্থীদের আগাম বার্তা। মনুবাদীদের সাথে একই সুরে সুর মিলিয়ে বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদ করের বিরুদ্ধে তারাও ষড়যন্ত্রে সামিল হয়েছে। এই যুদ্ধের মাষ্টার প্লান যে একই চৌখুপির আদলে তৈরি হয়েছে তা বোঝা যায় পরপর দুটি সম্মেলন থেকে। প্রথমটি সমাজবিজ্ঞানী আশিস নন্দীর জয়পুর কর্পোরেট বই মেলা এবং অপরটি চন্ডীগড়ে আয়োজিত কোলকাতার বামপন্থী বুদ্ধিজীবীদের দ্বারা পরিচালিত সেন্টার ফর সোস্যাল স্টাডিজ এর জাতি বিমর্শ সম্মেলন। এই দুটি সম্মেলনের চরিত্রই এক। একই সুরে ভিন্ন গান। একটিতে মূলনিবাসী বহুজন সমাজকে ভ্রষ্টাচারের জন্য অপরাধী ঘোষণা। অন্যটিতে মুলনিবাসী বহুজন সমাজের রাষ্ট্র ক্ষমতা অর্জনের ভাগিদারী সামাজিক শৈলীর নির্মাতা বাবা সাহেব ডঃ বিআর আম্বেডকরকে খারিজ করে দেওয়া !
জয়পুর সাহিত্য সম্মলনের মতই চণ্ডীগড় সম্মেলনও বহুজনবিরোধী মঞ্চে পরিণত হয় এবং সেখানে আম্বেডকরকে ভারতীয় আর্থ সামাজিক ও রাজনৈতিক প্রেক্ষাপটে অপ্রাসঙ্গিক হিসেবে ঘোষণা করা হয় এবং তাঁকে পুঁজিবাদ ও সাম্রাজ্যবাদের সমর্থক সাব্যস্ত করার প্রবল চেষ্টা হয়!
অর্থাৎ মূলনিবাসী বহুজনের স্বাধিকার, আত্তবিকাশ, আত্তমর্যাদা,স্বশক্তিকরন ও সক্ষমতা আর্জনের বিপক্ষে মাক্সবাদী-গান্ধীবাদী-মনুবাদীরা সব এক। একই সঙ্গে এটাও পরিষ্কার হয়ে যাচ্ছে যে, বিভিন্ন মতাদর্শের বিচিত্র রঙা সাইনবোর্ডের আড়ালে লুকিয়ে থাকলেও আসলে ওরা এক। ওরা বুঝতে পেরেছে যে, বাবা সাহেবের Social inclusive doctrine ৮৫% মূলনিবাসী বহুজন সমাজকে কেন্দ্রীভূত করে তুলবে। এবং এই ভাগিদারী সামাজিক শৈলী মুলনিবাসী বহুজনদের রাষ্ট্র ক্ষমতার কেন্দ্র বিন্দুতে নিয়ে আসবে। 
এবং শ্রেণি-সংগ্রামহীন, হিংসাশ্রয়ী রক্তরঞ্জিত যুদ্ধ ছাড়াই সংঘটিত হবে এক নিঃশব্দ রাষ্ট্র বিপ্লব। সর্বজনের কল্যাণে সর্বজনের রাষ্ট্রীয় উত্থান। আত্তউপলব্ধি ও আত্তিকরণের এমন নিঃশব্দ সামাজিক নির্মাণ সাধিত হলে একই সঙ্গে চতুর্বর্ণের ঘৃণার পাহাড় এবং শোষক-শোষিতের আজন্ম লড়াইয়ের মিথ্যে ধাপ্পা আস্তাকুড়ে জায়গা নেবে।
এটাই ওদের ভয়। তাই সব শিয়ালের এক রা ! একই সঙ্গে (মাক্সবাদ +মনুবাদ+গান্ধীবাদ)আক্রমণ শানাও। ত্রিশূল আর কাস্তেতে শান দাও। রামধুন জপ করো। মাওবাদীদের আমদানি করো। মোদির সাথে গলা মিলিয়ে বল ভারত নির্মাণের জন্য যুদ্ধ চাই। মহাপ্রলয় ছাড়া মহা নির্মাণ হয়না।
না, এ আশঙ্কা একেবারে অনৈতিহাসিক নয়। বরং বাবাসাহেব এমনটাই ভবিষ্যবানী করেছিলেন। মাক্সবাদকে সমাজ পরিবর্তনের একটি অনবদ্য পন্থা হিসেবে স্বীকার করলেও ভারতীয় মাক্সবাদীদের প্রতি তার কোন বিশ্বাস ছিলনা। বরং তিনি বলেছিলেন যে, এরা সবুজ ঘাসের আড়ালে লুকিয়ে থাকে দুমুখো বিষধর সাপ। সুজোগ পেলেই ছোবল মারবে। মনুবাদীদের বংশধরেরাই মাক্সবাদীদের ডিক্লাসড লিডার। তাই মার্ক্সবাদের নামে এরা মনুবাদকেই কায়েম করবে। 
এই বিষয়টি আরো পরিষ্কার করে দিয়েছিলেন মান্যবর কাশীরাম জি। তার অমোঘ ঘোষণা ছিল, মূলনিবাসীরা রাজনৈতিক উত্থানের মাধ্যমে রাষ্ট্র ক্ষমতা অর্জনের দিকে এগিয়ে গেলে সব মনুবাদী শক্তি এক হয়ে যাবে। 
কারণ সব রসুনের গোড়া এক জায়গায়। যার নাম মনুবাদ। বহিরাগত শোষকদের Divine প্রভুত্বের জীয়ন কাঠি"। 
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Saradindu Uddipan's photo.

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