BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Tuesday, September 15, 2015

अपना अस्तित्व बचाने के लिये एकजुट हो रहे हैं लोग लेखक : राजीव लोचन साह

अपना अस्तित्व बचाने के लिये एकजुट हो रहे हैं लोग


लेखक : राजीव लोचन साह


इस पखवाड़े नैनीताल में दो ऐसे भारी भरकम जलूस निकले, जिन्होंने 1994 के उत्तराखंड राज्य आन्दोलन की याद दिला दी। राज्य आन्दोलन के बाद ऐसा जलूस नैनीताल में  फिर शायद अगस्त 2011 में अण्णा हजारे के जन लोकपाल आन्दोलन को समर्थन देने के लिये ही निकला था।

nainital-candle-marchरविवार, 26 जुलाई को तीसरे पहर शेर का डाँडा पहाड़ी के सात नम्बर व आपसास के क्षेत्र के उन हजारों लोगों ने नगर में एक मौन जलूस निकाला, जिनके आशियानों के ध्वस्तीकरण के आदेश उत्तराखंड उच्च न्यायालय के कहने पर जिला प्रशासन और नैनीताल झील विकास प्राधिकरण ने जारी किये हैं। लगभग सात-आठ हजार लोग इस जलूस में शामिल थे। दो दिन बाद, 28 जुलाई की शाम इन्हीं लोगों ने एक 'कैंडिल मार्च' निकाला, जिसमें भीड़ पहले जलूस की तुलना में अपेक्षाकृत कम थी, किन्तु अंधेरे में जगमगाती हजारों मोमबत्तियों के सैलाब ने उसी तरह का रोमांचक प्रभाव पैदा किया, जैसा राज्य आन्दोलन के दौरान 14 सितम्बर 1994 को निकले मशाल जलूस ने पैदा किया था। कोई आश्चर्य नहीं कि 30 जुलाई को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ ने 'अजय रावत बनाम भारत सरकार एवं अन्य' के नाम से सुनी जा रही जा रही जन हित याचिका, जो इन दिनों शासन-प्रशासन के बदले नैनीताल नगर की पूरी की पूरी व्यवस्थायें सम्हाल रही है, की खंडपीठ से न्यायमूर्ति आलोक सिंह एवं न्यायमूर्ति सर्वेश गुप्ता को हटा कर उनके स्थान पर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति यू. सी. ध्यानी को रख दिया। हो सकता है कि पिछली सुनवाई में खंडपीठ और वकीलों के बीच उठे एक विवाद के बाद मुख्य न्यायाधीश ने यह कदम उठाया हो। यह जन हित याचिका कितनी शक्तिशाली है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मामूली से वकील भी कोर्ट कमिश्नर बन कर आयुक्त कुमाऊँ और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल जैसे अधिकारियों से ऐसा व्यवहार करने लगे हैं, मानों वे उनके अधीनस्थ कर्मचारी हों। जिन लोगों की साँसें पिछले एक साल से अटकी पड़ी हैं, उनमें खंडपीठ के इस बदलाव से कुछ आशा जगी है। प्रखर स्वतंत्रता संग्रामी भैरवदत्त धूलिया के पौत्र न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन और उत्तराखंड राज्य आन्दोलन में काफी सक्रिय रहे हैं, अतः उनसे संवेदनशीलता की आशा करना बेमानी भी नहीं है।

मगर इन प्रभावशाली प्रदर्शनों और न्यायिक खंडपीठ में आये इस बदलाव से न तो सात नंबर क्षेत्र के इन निवासियों की समस्या खत्म होने वाली है और न ही नैनीताल नगर के सर पर मँडराने वाला खतरा खत्म होने वाला है। जनता की एकजुट ताकत भी विज्ञान के भूलभूत नियमों को नहीं बदल सकती। यह इलाका कितना खतरनाक है, इसे समझने के लिये भू वैज्ञानिक होना जरूरी नहीं है। सामने अयारपाटा की पहाड़ी के किसी ऊँचे स्थान से देखने पर इसमें जमीन का उभार साफ दिखाई देता है, जिसे अन्दर रिसता हुआ पानी कभी भी उसी तरह नीचे की ओर बहा ले जायेगा, जिस तरह उसने 5 जुलाई को बिड़ला रोड के एक हिस्से को बहा कर मालरोड को दलदल बना दिया था। इस बार जान माल की कोई क्षति नहीं हुई। मगर यह इलाका टूटा तो क्या होगा, इसकी कल्पना करके ही सिहरन होती है। 18 सितम्बर 1880 के भू स्खलन में इसी पहाड़ी में हुई टूट से 151 व्यक्ति जिन्दा दफ्न हो गये थे। तब इस इलाके में कोई बसासत ही नहीं थी। इस वक्त यह नैनीताल का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है।

मगर समस्या है तो उसका समाधान भी होगा ही। मगर यह समाधान न तो न्यायपालिका की जिद से हो सकता है और न ही प्रशासन के डंडे से। न ही यह समस्या एक या दो माह में सुलझ सकती है। पहले समस्या को समझ तो लें। ब्रिटिश काल से ही यह इलाका 'असुरक्षित' माना गया। यहाँ निर्माण कार्य निषिद्ध रहे। नवम्बर 1984 में 'नैनीताल झील विकास प्राधिकरण' का गठन होने से पूर्व तक यहाँ शायद ही कोई ऐसा भवन होगा, जो नियम-कानूनों के अन्तर्गत न बना हो। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की तर्ज पर बने झील विकास प्राधिकरण को न तो नैनीताल की संवेदनशीलता की कोई जानकारी थी और न ही उसे इसकी जरूरत थी। यह बहुत जल्दी ही अवैध काम करवाने वाली एक ऐसी दुकान बन कर रह गया, जिसमें हर तरह का सौदा होता है। महंगी मशीनें भी बिकती हैं तो नमक की पुडि़या भी। एक ओर इसके अधिकारियों और कर्मचारियों ने बाहर से आने वाले बड़े-बड़े बिल्डरों को नाजुक पहाडि़यों पर भारी भरकम कंक्रीट के ढाँचे खड़े करने की अनुमति दे कर लाखों रुपये कमाये तो दूसरी ओर निर्धन आय वर्ग के लोगों को सही-गलत जगहों पर छोटी-छोटी झोंपडि़याँ खड़ी करने को प्रोत्साहित किया और इसकी एवज में हजारों रुपये वसूले। यह वसूली इन अवैध निर्माणों को अनदेखा करने के लिये होती थी। यह खेल इतना फलने-फूलने लगा कि कतिपय शातिर लोगों ने संदिग्ध किस्म की जमीनों को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट कर सिर्फ दस-दस रुपये के स्टाम्प पेपरों पर उनका सौदा कर डाला। फिर अपना वोट बैंक बनाने के लिए कुछ राजनीतिक नेता भी जमीन के इस खेल में शामिल हो गये। शुरू में जमीनें बेचने वाले और ऐसे निर्माण कार्य करने वाले थोड़ा सहमे-सहमे रहते थे कि वे कहीं कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं। मगर फिर प्राधिकरण, नगरपालिका, जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों की ओर से मौन सुरक्षा मिलने पर वे निश्चिन्त होते चले गये। जो कच्चे मकान थे, वे पक्के हो गये। जो इकमंजिले थे, वे दुमंजिले बन गये। बहती गंगा में हाथ धोने के लिये कुछ ऐसे लोगों ने भी यहाँ किराये में लगाने के लिये मकान बना डाले, जिनके अन्यत्र अपने अच्छे-खासे आवास थे। एकदम खड़ी ढलान पर बजरी के कट्टों की एक दीवार सी दे कर उन पर मकान खड़ा कर देने की एक ऐसी तकनीकी विकसित हुई, जिसे देख कर आँखें हैरत से खुली की खुली रह जाती हैं। प्राधिकरण बनने के आठ-दस सालों के भीतर ही नगर के कुछ जागरूक लोगों के प्रतिरोध के कारण ब्रजेन्द्र सहाय समिति की संस्तुतियाँ आईं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश आये, मगर नैनीताल नगर को बचाने की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा तो यह मान लिया गया कि जो कुछ भी हो रहा है ठीक हो रहा है, न्यायसम्मत हो रहा है। धीरे-धीरे इस तथाकथित 'असुरक्षित' क्षेत्र में इतने अधिक निर्माण हो गये कि आज नैनीताल नगर की लगभग बीस प्रतिशत आबादी इन्हीं इलाकों में रहती है। पिछले साल न्यायिक सक्रियता बढ़ने के बाद इस ओर दृष्टि गई थी और इस बार 5 जुलाई को मालरोड पर मलबा आने से अदालत ने बेहद सख्त रुख अपना लिया।

मगर सिर्फ कड़ाई से तो समस्या सुलझने से रही। इस एक साल में प्रशासन पर लगातार दबाव बना कर अदालत ने मालरोड और फ्लैट्स पर लगने वाले फड़ों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। नगर में साफ-सफाई की दृष्टि से यह बहुत अच्छा भी है। लेकिन इस निर्णय में रोजगार के सवाल को बिल्कुल अनदेखा कर दिया गया। जब सरकारी नीतियों की विफलता के कारण गाँवों में स्थितियाँ इतनी विकट हैं कि वहाँ आर्थिक उपार्जन तो दूर की बात रही, जंगली जानवरों के कारण पेट भरने के लिये अन्न उपजाना भी संभव नहीं है, तो गाँवों से नजदीकी शहरों की ओर पलायन तो होगा ही। सरकार के स्तर पर नौकरियों या स्व रोजगार के लिये पर्याप्त व्यवस्थायें नहीं हैं। तब क्या कोई ग्रामीण अपने बाल-बच्चे पालने के लिये सड़क पर भुट्टे भी न भूने ? तो क्या वह चोरी-चखारी पर उतरे या कि जेब काटने पर ? जबकि जरा सी कोशिश करने पर नैनीताल में ही इन लोगों के लिये योजनाबद्ध ढंग से व्यवस्था कर देना कोई कठिन काम नहीं था।

इसी तरह सात नम्बर और और आसपास के असुरक्षित क्षेत्र के निवासियों को सिर्फ डंडे से तो नहीं हाँका जा सकता। विशेषकर उस स्थिति में जबकि यहाँ रहने वाले निम्न या निम्न मध्य वर्ग के ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी जिन्दगी की पूरी कमाई अपने लिये एक अदद छत बनाने में झोंक दी है और उनके पास दुबारा कहीं बसने के लिये कोई पैसा नहीं बचा। वे इस अन्याय से भी बहुत अधिक नाराज हैं कि जिन नेताओं, अधिकारियों और जमीन के कारोबारियों ने पूरे आश्वासनों के साथ उन्हें यहाँ बसाया था, उनका तो बाल भी बाँका नहीं हो रहा है और उनके अस्तित्व पर चोट की जा रही है। अतः न्याय होता दिखने के लिये सबसे पहले उन जिम्मेदार अधिकारियों को ढूँढ कर उन पर दंडात्मक कार्रवाही होनी अनिवार्य है, जिन्होंने पिछले लगभग तीस सालों में यहाँ अवैध निर्माण होने दिये। ब्रजेन्द्र सहाय समिति ने अपनी रिपोर्ट के दूसरे भाग, जो गोपनीय थी, में उस वक्त तक के ऐसे दोषी अधिकारियों को चिन्हित किया था। दोषी अधिकारियों को न्याय के दायरे में लाने के बाद ही इस क्षेत्र में एक ऐसा सकारात्मक माहौल बन पायेगा कि समस्या का समाधान निकल सके। असम्भव कुछ भी नहीं है। इसके उपरान्त नैनीताल के आसपास कोई उपयुक्त जगह खोज कर इन लोगों को बसाना होगा। एक विकल्प तो पटवाडाँगर का भी हो सकता है। यहाँ युद्धस्तर पर सस्ते आवास बनाने होंगे। मगर इस काम के लिये सरकार में इच्छाशक्ति चाहिये और प्रशासन में लगन और ईमानदारी। इन दोनों चीजों का फिलहाल उत्तराखंड में पूरा अभाव है। इसलिये या तो अदालत और प्रशासन को अपने पाँव पीछे खींच कर नैनीताल के ऊपर मँडरा रहे खतरे को यों ही बने रहने देना होगा या फिर इस तरह के टकराव भविष्य में भी हमेशा होते रहेंगे। आखिर इस असुरक्षित क्षेत्र में रहने वाले न तो संख्या में फड़ वालों जितने कम हैं और न ही यह सिर्फ रोजगार का सवाल है। अपना अस्तित्व बचाने के लिये मनुष्य किसी भी सीमा तक जा सकता है।


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