BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

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Monday, January 16, 2012

शबाना नगर गली नंबर 60

http://www.aksharparv.com/prastavana.asp?Details=76

उपसंहार: शबाना नगर गली नंबर 60 

सर्वमित्रा सुरजन 

मशहूर फिल्म अभिनेत्री व सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने हाल ही में अपने जीवन के 60 बसंत पूरे किए। सिनेमा व थियेटर में अभिनय से लकर सामाजिक जीवन में उनकी सक्रियता व सकारात्मक भूमिका देखकर यह लगता ही नहींकि वे उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं, जहां लोग सेवानिवृत्ति की बात सोचने लगते हैं। अभी अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के एक दिन पहले उन्होंने भारत में बालिकाओं की स्थिति पर रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम में भाग लिया। हाल ही में दिल्ली में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर एक नाट्य प्रस्तुति भी दी। वे महिला सशक्तीकरण की बात करती हैं, कभी एड्स के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाती हैं, कभी साक्षरता की बात करती हैं तो कभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की। कुछ समय पहले वे सर्फ जैसे उत्पादों के व्यावासायिक विज्ञापनों के माध्यम से वे भारत की जनता को ये भी बताती थीं कि अगर इस डिटर्जेंट से कपड़े धोए जाएं तो कैसे दो बाल्टी पानी रोज बचाया जा सकता है। जिनके घरों में वाशिंग मशीन है, महंगा डिटर्जेंट खरीदने के लिए पैसा है और 24 घंटे नल आने की सुविधा है, वे ऐसे विज्ञापन मनोरंजन के बीच में देख लिया करते थे। शबाना आजमी 60 वर्ष की उम्र में भी वही मिसाल कायम कर रही हैं, जो आशा पारेख, वहीदा रहमान, रेखा, हेमा मालिनी जैसी अभिनेत्रियां करती आयी हैं। गुजरे जमाने की इन तमाम अभिनेत्रियों की सक्रियता व जीवटता आश्चर्य में डाल देती है। रेखा को छोड़कर उपरोक्त तमाम अभिनेत्रियां किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं। किंतु शबाना आजमी की एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान उनके अभिनेत्री होने के साथ-साथ बनी रही। कला व समानांतर सिनेमा में उनकी भूमिकाओं ने इसे और पुख्ता किया। मुंबई के झुग्गी-झोपड़ी इलाके धारावी के लोगों के पुनर्वास, रहने की बेहतर व्यवस्था करने के लिए उन्होंने लंबे समय तक जो काम किया, उससे उन्हें विशेष पहचान मिली। हिन्दी फिल्मों के लोगों ने भी इसका नोटिस लिया। फरहा खान ने अपनी फिल्म ओम शांति ओम के एक दृश्य में शबाना आजमी से इस आशय का संवाद भी बुलवाया है कि वे अवार्ड समारोह का बहिष्कार करती हैं, क्योंकि इसमें स्लम के लोगों के अधिकारों का हनन हुआ है। फिल्म में यह दृश्य मखौल उड़ाने के अंदाज में फिल्माया गया है। लेकिन असली जिंदगी में भी अंदाज अलग कहां है। शबाना आजमी के पति मशहूर फिल्म गीतकार व शायर जावेद अख्तर ने अपनी पत्नी के जन्मदिन समारोह की एक शानदार दावत मुंबई में रखी, जिसमें खबरों के मुताबिक बच्चन परिवार समेत कई फिल्म हस्तियां शामिल हुईं। इस दावत के लिए जावेद साहब ने एक विशेष केक तैयार करवाया, जिसका आकार झुग्गी झोपड़ी इलाके की तरह था, कच्चे घर थे और बीच में बहता नाला भी आइसिंग से तैयार करवाया गया था। केक के बीच में बोर्ड लगा था शबाना नगर गली नं 60। मुंबई जैसे खचाखच भरे शहर में, जहां सामान्य आदमी पैर सीधे रखने लायक जगह को भी जरूरत से ज्यादा समझता है, वहां भव्य घरों में रहने वाले फिल्मी सितारों के लिए झुग्गी-झोपड़ी मनोरंजन और मजाक का विषय है। आम फिल्मी सितारों की संवेदनहीनता पर कोई प्रश्न उठाना निरर्थक ही होगा। किंतु वामपंथी विचारों वाले मशहूर शायर कैफी आजमी की बेटी व जां निसार अख्तर के बेटे की सोच भी सात सितारा हस्तियों की तरह रहे तो फिर क्या कहा जाए। इस केक के बारे में निंदा के स्वर उठते ही जावेद अख्तर ने कहा कि शबाना को इसके बारे में कुछ नहींपता और उन्होंने उनके सदा इसी काम में डूबे रहने की वजह से स्लम के आकार का केक बनवाया, लेकिन निंदा करने वाले इसमें छिपे गुड ह्यूमर को समझ नहींपाए। फिलहाल तो यही समझ नहींआ रहा कि जावेद साहब के इस गुड ह्यूमर को हिंदी में परिभाषित कैसे करें। अच्छा मजाक या कुछ और। शबाना आजमी की विशिष्ट पहचान जिस काम की वजह से बनी, उसका मजाक जावेद साहब ने उड़ाया, या स्लम में रहने वालों का कि देखो तुम जिस नरक में रहते हो, उसे हम यूं मजे-मजे में अपना निवाला बना लेते हैं। शबाना आजमी की 60वींवर्षगांठ पर जावेद साहब का यह गुड ह्यूमर बदमजा ही साबित हुआ। 
-सर्वमित्रा सुरजन
 

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